"किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसिली बात लिखूं? ग़ज़ल की मैं तहज़ीब निभाहूँ , या अपने हालात लिखूं?"

-ज़ावेद अख्तर

ग़ालिब, जैसिका और मैं भी

बुधवार, २० जनवरी २०१०

यहाँ...
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भावनाओं की रेश ड्राइविंग में...
सीट बेल्ट पहना हुआ,
शॉक रेजिसटेंस दिल ,
उछल के....
बाहर नहीं निकलता.

आंसू भी ,
'एटीकेट' के 'नेपकिन' में...
...सूख जाते हैं.
ये जिंदा सड़कों के नीचे,
मरे हुए कोलतारों की दिल्ली है.



यहाँ हर रिश्ते का एक बारकोड है
हर प्रेम का एक इवेंट मेनेजर .

यहाँ हर आदमकद बिलबोर्ड के पीछे,
छुपी हुई है हैवानियत...

और एक के पीछे एक ...
छुप गयी है सारी छोटी - छोटी संवेदनाएं...

कुछ मातम, कुछ दर्द के ,
हॉट ऍम. ऍम. एस. हैं यहाँ.

और हर उत्सव हर ख़ुशी के लिए,
एक (- न - एक ) एस. ऍम. एस .




ये जिस्म की दिल्ली है,
'स्वेच्छा' से होता है 'बलात्कार ',

ये ज़िन्दगी की दिल्ली है,
थोपी जाती हैं आत्महत्याएं.

रात की चमक ,
और दिन के अँधेरे में,
बस ,
मेन गेट
और टाइम ऑफिस के बीच का फासला है,
बीच में है...
'रूबी ट्युज़डेज़'.

19 Comments.:

L.R.Gandhi ने कहा…

बहुत खूब.....

हर पल मर कर ,जीने को ।
.... कहने लगे वो जिंदगी ॥

अगर ये ही दिल्ली है तो ऐसी क्यों है ........... महानगर की बहुत ही खोफ़नाक तस्वीर खैंची है आपने दर्पण जी ........ हमको तो लगता था दिल्ली दिलवालों की है ...... आपने तो इसे सौदागरों की नगरी बना दिया .........
पर सच मैं आपकी कलाम ने दुबारा से साबित कर दिया की वो कमाल की रचनाएँ देने में बहुत ही सक्षम है ......

सागर ने कहा…

ओह तो ये तिलस्म आ ही गया दर्पण बाबू ...
अच्छा ही एडिट किया है, छोटे से दिमाग मैं कितना कुछ भरा रखा है!!! और दृष्टि ????/

वन्दना ने कहा…

darpan

aaj ek baar phir tumne bahut hi halke tarike se kitni gambhir baat kah di aur shayad yahi to tumhari khoobi hai...........vaise janab aap hain kahan aajkal?darshan durlabh ho gaye hain..........prabhu darshan dijiye.........nayan katore taras rahe hain.

अद्भुत बिलकुल तुम्हारी तरह 100 चटके लगाने वाली रचना ---- आशीर्वाद

darpanji,
delhi ke sandarbh me bahut si kitaabe padhhi he, etihaasik aadi, khushvant singh ki ek kitaab he 'DILLI'usase bhi jaanaa tha DILLI ko..ab aapki rachna../ dilli abhishpt he,,kitani baar ujadi kitani baar bani..aour ese me aaj kaa dour.../subhanallah/ 21 vi sadi ki dilli me bhi vahi sab he jo pahle hota rahaa he../bas andaaz badlaa he.
aapki rachna me dilli ka dard he..usaki peedaa he...par sirf yahi ekmaatra????esa bhi nahi he..mujhe lagtaa he../// kher./ darshanroopi rachna..jiska me deevana hu.

नासवा जी ! दर्पण जी ने कोई नयी बात नहीं लिखी है दिल्ली के
बारे में .. सदैव से सौदागरी रही यहाँ , और भी कवियों ने लिखा है :
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सो दिल्ली अस निब्हुर देसू |
कोई न मिला जेहिं कहै सनेसू || ( जायसी )
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वैभव की दीवानी दिल्ली |
कृषक मेद की रानी दिल्ली |
अनाचार अपमान व्यंग्य की
चुभती हुई कहानी दिल्ली || ( दिनकर )
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दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गीजर उसी ने लूट लिया | ( शायर बी. बद्र )
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फिर भी वली साहब को अच्छी भी लगी थी :
दिल वली का ले लिया दिल्ली ने छीन
जा कहे कोई मुहम्मद शाह सूं | ( वली दकनी )
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तो दर्पण साहब ! आपकी कविता अच्छी लगी ! नए ढंग से , नए अल्फाजों से , नए
बिम्बों से दिल्ली दिखाया ! आभार !

टाइपिंग मिस्टेक ....... सॉरी ........ गीजर = ''गुजरा '' माना जाय मेरी पूर्वोक्त टीप में ! क्षमा !

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

kya baat ki sir ji!!!LAAZWAB!

Udan Tashtari ने कहा…

बड़ी ही अजब लेकिन लाजबाब अभिव्यक्ति है दर्पण..कुछ अलग सी फिर भी जुड़ी जुड़ी सी.

प्रकाश पाखी ने कहा…

गजब ..अद्भुत...दर्पण भाई,बड़े दिनों बाद एक नएपन और नवाचार से भरी कविता पढने को मिली ...ऐसे बिम्बों का प्रयोग करना आपकी लेखनी को एकदम अलग करता है...आनंद आ गया ..इतना खुश हुआ हूँ कि बता नहीं सकता...!

badhiya..

वाणी गीत ने कहा…

ये जिन्दगी की दिल्ली है ...थोपी जाती है आत्महत्याएँ ...
मुझे लगता है ये हर शहर की बात है ..दो दिन पहले ही अखबार में 3 आत्महत्याओं की खबर थी...

ओम आर्य ने कहा…

Usne thik hi kaha tha tumhe- Chain-smoker

रंजना ने कहा…

आपकी शब्द योजना ने तो निःशब्द ही कर दिया है.....
अद्भुद...अभूतपूर्व ....वाह !!!

कैसा सटीक चित्रण किया है आपने,कटु यथार्त का कि "वाह" स्वतः ही मुंह से निकल जा रहा है..
संजो कर रखने योग्य है आपकी यह रचना...

क्या आधुनिक प्रतीक हैं मित्र! ज्यादा कवितायें पढ़ी नहीं, पर क्या हिन्दी में इतने आधुनिक प्रयोग हो रहे हैं?

बहुत पसन्द आई।

अनिल कान्त : ने कहा…

तुम एक अच्छे प्रयोगधर्मी कवि हो...बहुत अच्छा लगता है तुम्हें पढ़ना

"अर्श" ने कहा…

ये दर्पण का दूसरा पहलू है , पहले में खुद का अक्स नज़र आता है सभी को ...
इस बेबाकी के लिए बधाई दर्पण....


अर्श

Pankaj Upadhyay ने कहा…

वाह.. हिन्दी क्या है.. ये है.. हम सबकी जबान..
जो बस विस्की के एक घूट की तरह हलक मे उतर जाती है और थोडी देर बाद एक बेहिसाब खुमारी चढती है..

बहुत अच्छे प्रयोग है दोस्त, लिखने को बडा प्रेरित करते है..

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ज़िन्दगी भी कितनी लम्बी होती है ना??
उम्र भर चलती है...