रविवार, 9 जनवरी 2011

डिवाइन कॉन्सपिरेसी

हमें वही चीज़ नहीं करने को कही गयी,
जो हमें वाकई नहीं करनी थी.
'लालच','उत्सुकता' और 'धृष्टता' कमजोरियां थीं.
फ़िर भी ये 'प्रथम फल' खाने से पहले कैसे पैदा हुई हममें?
इश्वर तेरे षड़यंत्र के शिकार हम,
हमारी शुरुआत ही गलत करवाई गयी.

हम सबसे पहले जान लेना चाहते थे धूप उगाना,
पर हमें सबसे पहले ये बताया गया कि धूप,
आसमान में ही उग सकती है.
एक नामुमकिन सी जगह.

कहीं उड़ने को हम उड़न तश्तरी ना बना लें,
तब तुमने , ओ इश्वर,
हमें पकड़ा दिया 'झुनझुना'
हमें बता दी पत्थर से आग बनाने की विधी.
और तब हमने उगाये  खेतों में पत्थर.
और यूँ आग के आविष्कार के चक्कर में,
हम पिछड़ गए उड़न तश्तरी बनाने को,
धूप उगाने को.

और जब हम ऊब जाने की हद तक,
आग जलाने के अभ्यस्त हुए,
हमें बताया गया आग और स्वाद का सम्बन्ध.
तब तक पत्थर भी घीसे ही जा चुके थे,
उनके नुकीले-पन ने हमें शाकाहारी नहीं रहने दिया.
लेकिन फ़िर भी पत्थर बहुत थे,
और ज़्यादातर नुकीले.
अस्तु...
कबीले बने, देश बने...
राजा, महाराजा...
ऍम. डी., सी. ई. ओ. ...
हम भी इश्वर बन सकते थे,
पर हमें भुलवा दिया गया,
हम भी इश्वर बन सकते हैं,
उड़न तश्तरी बना सकते हैं,
धूप उगा सकते हैं.


जब हमें यकीन हो आया कि धरती के दो छोर हैं,
जहाँ से कूद से आकाश में पंहुचा जा सकता है,
तेरे पैगम्बरों ने घोषणा करी कि दुनिया गोल है...
कुछ लोग विश्वास भी कर गए,
और तब से ही दुनिया गोल है.

एक दिन सबको पता लगा कि आकाश जैसी कोई चीज़ नहीं,
तब से,
हाँ ठीक तब से, कुछ ना होना आकाश हो गया.
उफ्फ...


तुझे मुसलसल हमारे सपनों से डर लगता रहा,
हम तेरी चाल समझते जा रहे थे,
तू और चालाक होता जा रहा था.
और यूँ,
जब हम साथ में मिलकर,
बना सकते थे उड़न तश्तरी,
उगा सकते थे धूप.
तुमने अपने पैगम्बर भेज के हम सब में फूट डाल दी.
"वैज्ञानिक."

न्यूटन !
था तो पहले वो भी इन्सान,
पर तुमने ही उससे कहा कि जाओ,
बताओ...
हम सब धरती से चिपके हुए हैं.
और उसके कहने के बाद से हम देखो वाकई धरती से चिपके हुए हैं.

आइन्स्टीन !
तुमने ही बताया उसे...
और हमें उसने...
कि हम कोई भी चीज़ उगा नहीं सकते,
पैदा नहीं कर सकते,
और तब से कुछ भी पैदा नहीं होता इस धरती में.
(कभी उड़ती खबर आई थी दो ढाई हज़ार साल पहले कि तू पैदा हुआ है.)


भांडा तो तेरा,इश्वर...
लिओनार्डो ने फोड़ना चाहा था,
तभी तेरे गुर्गों ने उसे चित्रकार घोषित कर दिया...
'चित्रकार' हंह !


ठीक उस वक्त,
हमारी सच्चाइयों को सब कल्पना कहने लगे.....
हम कभी भविष्य में पढ़ा जाने वाला इतिहास हो गए,
तेरी साजिश के शिकार हम,
हम लेखक, कवि, चित्रकार.

क्या ये सच नहीं कि शब्दों से
'उ-ड़-न-त-श्त-री' बनाना,
हम कबके सीख चुके थे.
इतना तो मानते हो ना तुम कि,
कविताओं में उगा भी ली थी धूप?
और हाँ,
चित्रकार पैदा कर चुके थे कई सारे सूरज,
बचपन से ही,
आँख, नाक और हँसते हुए सूरज,
ठीक उड़ती चार चिड़ियों के पास.

इश्वर यकीन करो,
हम नंगे रहकर भी,
बिना पका खाकर भी,
बिना किसी 'कोर्पोरेट - हयार्की' के,
बिना देश और कबीलों के 'वैलिड पासपोर्ट' के,
बिना रिलेटिविटी के सिद्धान्त के,
और गुरुत्वाकर्षण के बावजूद,
बना सकते थे 'उड़न तश्तरी',
उगा सकते थे 'धूप'.
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