ज़िन्दगी भर तुझे हम मनाते रहे.

ज़िन्दगी भर तुझे हम मनाते रहे.


मुस्कुराते रहे, दिल लुभाते रहे,
बात कुछ और थी, तुम छुपाते रहे.

दर्द जैसे मुसलसल ग़ज़ल हो कोई,
लोग सदियों इसे गुनगुनाते रहे.

इस कदर मुफलिसी का चढ़ा है जुनूं,
अपने एहसास भी हम लुटाते रहे.

एक शोखी नयी, इक नया सा सुकूं.
इस भरम में ही पीते पिलाते रहे.

ख़ैर दुनियाँ तो हमने भी देखी नहीं,
हाँ मगर एक दुनियाँ बनाते रहे.

ज़िन्दगी रूठ जाने की हद हो गई,
ज़िन्दगी भर तुझे हम मनाते रहे.

तुम चले भी गए , और गए भी नहीं,
'होंठ-में-स्वाद'  से  , याद आते रहे.

आज जाकर मुकम्मिल हुई इक ग़ज़ल,
आज अपना ही लिक्खा मिटाते रहे.



त्रिवेणी

आज 'संदूक' फिर देखता हूँ ज़रा,
कुछ छुपा था कहीं, हम दिखाते रहे.
एक रिश्ता पुराना हुआ फेंक दूं.

एक नेनो सेकंड

तो अब,
रिसता है...
पर बहता नहीं.

तो अब,
रिश्ता है,
पर कहता नहीं.

तो अब,
रहता है,
पर चुभता नहीं.

तो अब,
है हर जगह,
दिखता नहीं बस.

इस तरह से,
मुकम्मिल हुआ है,
दर्द.

कि आवाज़ भी नहीं,
कोई साज़ भी नहीं.
धडकनें भी नहीं,
सासें भी नहीं.

बस एक मुकम्मिल दर्द,
इस तरह कि,
कोई दर्द नहीं.

एक भंवर बना है दर्द का,
कि जिसमें खुद ही गुम है वो.
बाहर आता है,
दिखता है,
छुप जाता है.

कि जैसे था ही नहीं.
कि जैसे होगा ही नहीं.

...बस है !

और ये होना,
था नहीं कभी.
होगा भी नहीं शायद .

जब,
ये किनारे मिलेंगे,
जब ये पल बीतेगा,
तो दर्द छुटेगा,

हाँ पर...

...ये पल बीते तो.

क्षणिका

"अरे बाबा ! कह तो रही हूँ ना,
नहीं जाऊँगी  तुम्हें छोड़ के कभी!!"
...जाऊं, अब?