शनिवार, 5 जुलाई 2014

बहने दो इस ऑरा में अपनी सारी नफरतें...

प्रेम की एक्सट्रीम क्या है
डूबकर नफ़रत करना

नफ़रत न की तो प्रेम झूठ था तुम्हारा
प्रेम का डायल्यूटेड वर्ज़न था वो सिम सिम कर जलना

अरे
प्रेम के एहसास इतने प्योर थे जब
तो नफरतों को क्या हुआ तुम्हारी?

"जहाँ ऊंचाई होगी तो निचाई भी होगी" कहकर
क्लिशे मत करो ये बात
ऊंचाई के वजह से ही तो निचाई है
गहराई है
जितना ऊँचा होगा तुम्हारा प्रेम
उतनी ही गहरी होनी चाहिए तुम्हारी नफरतें

मैं उन्हें पाखंडी समझता हूँ जो कहते हैं
उनके ह्रदय में प्रेम ही प्रेम है

खून करने की 'सोचो' प्रेम करने की नहीं।
प्रेम स्वतः 'होगा' इस तरह
जला देने की सोचो ये दुनियां
यूँ बस जाए शायद वो

जानो नफ़रत को
वो जानते ही समाप्त हो जायेगी
वो जानकर ही समाप्त होगी
जिस युग का इतिहास युद्ध होगा
प्रेम कविताएँ होंगी उस युग का साहित्य
वही धर्म कहेगा प्रेम की बात
जो धर्म नफ़रत से भरा धर्म होगा

तुमको देखकर आश्चर्य होता है
जब तुम कहते हो
सर्वे भवन्तुः सुखिना
अस्तु तुम दुनियाँ के सबसे दुखी लोग हो

यकीन करो जान जाओगे एक दिन प्रेम
असली प्रेम
ख़ालिस प्रेम
मगर पहले
खुलकर बोलो नफ़रतों के बारे में

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर !!, बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें !!!

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'ज़िन्दगी' भी कितनी लम्बी होती है ना??
'ज़िन्दगी' भर चलती है...

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