शनिवार, 5 जुलाई 2014

लव एट दी टाइम ऑव... ...बीइंग इन लव !

मुझे किसी 'कोई नहीं' से प्रेम हुआ चाहता है
किन्तु वो 'कोई नहीं' 'कोई भी नहीं' नहीं है
वो कोई है 
किन्तु वो 'कोई न कोई तो है' नहीं है
वो 'कोई जिसे मैं नहीं जानता' नहीं है
किन्तु 'पता नहीं कौन' तो कतई नहीं है

मुझे बर्फ पड़ने का आनन्द बिना बर्फ पड़े आ रहा है
अब वास्तविकता में बर्फ पड़ जाने के की दशा में अपना आनंद बर्फ के ऊपर आरोपित करना पड़ रहा है
बर्फ का वास्तविकता में पड़ जाना मेरे वास्तविक एहसासों को झुठला दे रहा है
किसी न होने से प्रेम करने के पश्चात
'किसी से भी' या 'किसी से' प्रेम करना अवास्तविक लगता है मुझे
मैंने 'किसी की कल्पना' से नहीं किया प्रेम
अतः कोई हो जाए सामने तो उसकी कल्पना करनी पड़ेगी
किसी स्थूल पर आरोपित हो जाए यदि मेरा प्रेम
तो मेरा प्रेम छद्म हो जाएगा
वाह्य 'न' हो जाना यदि 'हो जाना' हो जाएगा
आंतरिक 'होना' समाप्त हो जाएगा

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'ज़िन्दगी' भी कितनी लम्बी होती है ना??
'ज़िन्दगी' भर चलती है...

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