बृहस्पतिवार, 9 फरवरी 2012

किसी चर्च और किसी कैसिनो में प्रार्थना करने में केवल इतना अंतर है की कैसिनो में आप 'वास्तव' में प्रार्थना कर रहे होते हैं.


मैंने देखी है वर्तमान इश्वर की सार्थकता,
वो कम से कम,
"यहाँ पेशाब करना मना है" या
"नो स्पिटिंग"
वाले जुमले से तो अधिक ही कारगर है.
ये इश्वर ही हो सकता है,
जो जिंदगी दे सकता है आपको,
धार्मिक वैमनस्य में बिन ब्याही माओं के गर्भ से भी.
और ले भी सकता है,
ऐसे  ही किसी दंगे में,
बिना कोई कारण बताए.
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अफीम और उन्माद के नशे में वे लोग कत्ल, बलात्कार और छीना झपटी जैसे  अपने क्लासिक-इन्सटिंक्टस भूलकर  अबकी पैगम्बर बन बैठे हैं,
वो  'चिल्ला-चिल्ला' के कह रहे हैं शांत हो जाओ,
शांत हो जाओ, और लाइन लगा के खड़े हो जाओ थोड़ी ही देर में आपके गले काटे जाएंग.
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सुनते हैं कि धर्म तो अवसादों, दुखों और पीडाओं से बाहर निकलने का पासपोर्ट होता है,
ये इश्वर तक पहुंचने का वीज़ा कब हुआ न जाने?
वो कौन सा कॉमन-वीज़ा है जिससे ऑस्ट्रेलिया, अफगानिस्तान और गुजरात में समान रूप से स्वच्छंद घूमा जा सके?
और  वो कौन सा सम्प्रदाय है जिसमें या जिसको अपनाकर
मेरी इस कविता को बिना किसी प्रिज्यूडिस के पढ़ा जाएगा?
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मैंने ज्यादा कुछ नहीं पढ़ा,
न ज्यादा कुछ जानता ही हूँ.
क्या आप में से कोई बता पायेगा मुझे,
किस खुदा को मानकर चिड़ियों का चहचहाना अधिक मुग्धकारी होगा?
कौन सा इश्वर मेरे 'ऊँचाई से गिरने के भय' को सच में समाप्त कर देगा?
यकीनन अतीत में कोई ऐसा काइंड-रिलीजन, ऐसा मोडएस्ट-सम्प्रदाय और ऐसा सॉफ्ट-खुदा रहा होगा,
और कालान्तर में वो ऑनर किलिंग के स्लो पोइजन का शिकार हो गया होगा,
बट ऑव्यस !
और अब, धर्म के नाम पर जो भी बाकी रहा वो केवल शक्तिशाली है बस
ऐसा कोई जो हमारी रक्षा करता है,
और उसके एवज में हफ्ता देना पड़ता है उसे.
हमने उसकी रक्षा करनी चाहिए थी जब वो थोड़ा थोड़ा नष्ट हो रहा था,
पर तब,
तब शुक्र है, हम अपने को थोड़ा थोड़ा बचा ले गए.
मांडवाली करके.
मुझे लगता है उस लुप्त हुए इश्वर के 'फोसिल्स' हमारे अंदर कहीं अब भी दबे पड़े हैं.
वो 'धर्म' जिसका डी. ऍन. ए. किसी मच्छर के खून से नहीं निकाला जा सकता.
उसकी  कला हमें किसी मधुमक्खी से सीखनी होगी.
और जिस दिन ये कला आ गयी,
मुझे लगता है तब चिड़ियों का चहचहाना अधिक मुग्धकारी होगा.
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बहरहाल मैं मतलबी हूँ और जिंदा रहना चाहता हूँ,
मुझे पता नहीं क्यूँ ये लगता है,
किसी भी धर्म का व्यक्ति मेरा कत्ल करेगा मुझे एक बराबर दर्द होगा.
मेरी मौत एक बराबर मौत होगी.
और मुझे डर है उस वक्त दब कर न रह जाये ,
अल्लाह हो अकबर या जय श्री राम के उदघोष के बीच मेरी मदद की पुकार.
तो, अगर किसी धर्म में 'अहिंसा' और 'सद्व्यवहार' बोल्ड लेटर में लिखे मिलें मुझे,
तो मैं उसके ठीक विरोधी धर्म अनुयायी बनना चाहूँगा.
टू बी ऑन अ सेफर साइड.
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जब वो मेरा कत्ल करेंगे,
मैं उनको कोई धार्मिक उपदेश नहीं दूँगा,
जैसे कि,
"आप गलत कर रहे हैं." या,
"आपका खुदा, इश्वर या वाहे गुरु भी नहीं चाहता आप ऐसा करें."
इन्फेक्ट मैं उन्हें बताऊंगा सीधा सा गणित कि,
एक से भले दो होते हैं,
और मुझे 'बाल कटवाने' या 'खतना' करवाने में मर जाने से कम दर्द होगा.
मैं मतलबी हूँ, जैसा मैंने पहले भी कहा
और मैं जिंदा रहना चाहता हूँ,
बेइज्जत होकर खुदा बदल कर या जिंदगी भर बाल न कटवाकर
जैसे  भी.
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क्षेपक : यदि आपका इश्वर मेरे इश्वर से अधिक शक्तिशाली है या वाइस-वर्सा तो उन्हें आपस में लड़कर ये सिद्ध करना चाहिए अब. 
वन-ओ-वन !  
हमारे कहने से कुछ नहीं सिद्ध होना. न हमारे 'ऑन बिहाफ ऑव'  लड़ने से. खामख्वाह !

15 Comments.:

  1. सत्य और असत्य को पहचानना सीखें.....सारे भ्रम अपने आप मिट जायेंगे....और ये कहानी कहने की आवश्यकता नहीं रहेगी....

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  2. ईश्‍वर की व्‍याख्‍या का बढि़या अंदाज.

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  3. यह भी देखने लिखने का अच्छा नजरिया है। अलग अन्दाजे बयाँ!

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  4. निर्भर करता है कि क्या दाँव पर लगा बैठे हैं..

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  5. भारत में हफ्ता, रिश्वत आदि क्यों है? हम भगवान को अधिक मानते जो हैं!उसकी दिखाई राह चलते हैं.
    घुघूतीबासूती

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    उत्तर
    1. इश्वर पर विश्वास करें.।
      यह वाक्य उतना ही समझ में आता है जितना की स्वयं इश्वर ।
      खैर भगवान को मानो ! क्या मानो ?
      क्या विश्वास करूं..
      " की जो भी हो रहा है अच्छा ही होगा "
      जब जो भी होगा अच्छा होगा, मान लेता हूं....फिर मैं क्या करूं , मुझे करना क्या है ?
      ये ख्याल तो अक्सर मुझे पूरा दिन बिस्तर पे गुजार देने का पास्पोर्ट लगता है. ।
      विश्वास करूं.... सारी टू से..बट घन्टा विश्वास करूं ?

      हटाएं
  6. इश्वर पर विश्वास करें.।
    यह वाक्य उतना ही समझ में आता है जितना की स्वयं इश्वर ।
    खैर भगवान को मानो ! क्या मानो ?
    क्या विश्वास करूं..
    " की जो भी हो रहा है अच्छा ही होगा "
    जब जो भी होगा अच्छा होगा, मान लेता हूं....फिर मैं क्या करूं , मुझे करना क्या है ?
    ये ख्याल तो अक्सर मुझे पूरा दिन बिस्तर पे गुजार देने का पास्पोर्ट लगता है. ।
    विश्वास करूं.... सारी टू से..बट घन्टा विश्वास करूं ?

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  7. और मैं जिंदा रहना चाहता हूँ,
    बेइज्जत होकर खुदा बदल कर या जिंदगी भर बाल न कटवाकर
    जैसे भी
    .. वाह! यूं ही लिखते रहिए। मन को झंझोड़ती रचना है यह।

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  8. dharam chalak logo ka jal hai.murakh uska sikar hotay hai.

    nice

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  9. बहुत ही खूबसूरत और इंट्रेस्टिंग रचना...

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  10. ये इश्वर ही हो सकता है,
    जो जिंदगी दे सकता है आपको,
    धार्मिक वैमनस्य में बिन ब्याही माओं के गर्भ से भी.
    और ले भी सकता है,
    ऐसे ही किसी दंगे में,
    बिना कोई कारण बताए.



    ओह इस अभागे ज़िंदगी कों कंधा देने के लिए भई बहुत जरूरी है ईश्वर का होना..., ईश्वर, वज़ह बनकर खुश है और हम दुनिया बनकर दुखी....सिर्फ इसलिए कि इस सतरंगी स्वेटर फंदा दर फंदा सिर्फ उसकी डिज़ाइन का गुलाम है...!

    ***

    घोषणा जिससे बहरों कों भी सुनना आ जाए: के 'इंस्टिंक्ट' कॉमन है पैगम्बरों और आमोखास में..! और के सर कलम करवाना जरूरी है स्वर्ग के टिकट के लिए..!

    ***

    घर की बाउंडरी गिरवा दी बौद्धिकों ने पर बेड़ियाँ जहाँ-तहां पहना दी और कहा अब तुम कहीं भी घूम सकते हो, याद रखना स्वतंत्रता एक उच्च नैतिक अनुशासन है इसे मानना तुम्हें सुसंस्कृत बनाएगा...यह तुममे बस केवल कुछ क्वालिफाइड प्रीज्यूडिस भरेगा..!

    ***

    ईश्वर, आदमी से भी खूब डरा हुआ है, उसे ठेकेदारों ने थका हुआ जल्लाद बना दिया है...वो अब मारना किसी कों नहीं चाहता पर मजबूर है कि कहीं उससे उसकी बेसिक पहचान ना छीन ली जाए...आखिर इंसान कुछ भी कर पाता है...

    ***

    मै भी मतलबी होना चाहता हूँ, पर मुझे अक्सर उसकी तलब लग जाती है.....

    ***

    सेकुलर शब्द में अब इतनी ताकत तो रही नही, सारे जहां के माननीयों ने उसे खूब चूसा है. फिर भी इसके समानांतर कोई और शब्द गढ़ने की मेरी ताकत नहीं. सो इसे मै 'एक सेकुलर आरोपण ' कहने की इजाज़त चाहूँगा..!!!

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  11. झकझोरने वाली पंक्तियां. क्या बात है. ईश्वर/ वाहेगुरु/ अल्लाह/ जीसस.....से प्रार्थना है आप ऐसे ही लिखते रहें.

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  12. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  13. हमारी मानें तो अल्ला हू अकबर...जय श्री राम..बोले सो निहाल...
    हय्या हो हय्या...जोर लगा के हैश्श्शा...
    में कोई ख़ास फर्क नहीं...

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'ज़िन्दगी' भी कितनी लम्बी होती है ना??
'ज़िन्दगी' भर चलती है...