रविवार, 27 जनवरी 2013

युवा

हमारा सवेरा ४ बजे का सात्विक सवेरा नहीं...
११ का 'हेंग ओवर' सवेरा है.
जो ज़िन्दगी के खट्टेपन को,
सपनों के नमक लगा के चाट डालता है.

हम,
जो बस,
पासे के फैंक दिए जाने के बाद से...
'हार जाने तक'
भर की उत्तेजना हैं.

हम,
चमकते खंजरों के पीछे घिसे हुए मौलिक,
फिंगर प्रिंट्स .
जिसकी शिनाख्त,
ग़ालिब आके नहीं कर सकते.

हम,
अपनी-अपनी प्रेमिकाओं को,
ओर्गेज्म और धोखा दिए जा चुकने के बाद,
दीवारों के ऊपर उकेरे गए...
कुंठित
शब्द विन्यास...
'शादी से पहले, एक बार अवश्य मिलें.'

हम बढ़ी हुई दाढ़ियों में छुपे हुए आत्म विश्वास हैं.
टिके रहने वाला पलायन हैं हम.
हम शराब की बोतलों से पैदा होने वाली छोटी छोटी अपेक्षाएं हैं...




एक) अपेक्षाएं 'मादा' होती हैं,
दो) इन्होनें अभी होश नहीं संभाला.
और,
तीन) भ्रूण हत्या बस 'कानूनन अपराध' भर है.

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

नब्ज को काट लेने दो ..कफ़स भी कैद है...




(1)

मैं निर्मित करता एक आकाश
तुम्हारे भर के लिए
जैसे ऑरेकल
या शायद नियो करतें है मैट्रिक्स में.
पर तुम्हारे वास्ते इस सुविधा के मानी तुम्हारी आज़ादी में हस्तक्षेप होता ।
"बड़े से बड़ा कफ़स भी कैद है ।"
इसलिए मैंने बनाए तुम्हारे एक जोड़ी पंख,
आकाश किसी विकल्प सा खुला छोड़ दिया तुम्हारे लिए ।
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(2)

ये ख़ब्त ही सही
इसे पागलपन ही कह लो !
बची हुई स्लिपिंग पिल्स नहीं गिनी कयी दिनों से
शामें उतनी क्या कितनी भी उदास नहीं रहीं अब
मैं ठीक ठीक बता सकता हूँ ऐसा कबसे हुआ
मैं ठीक ठीक बता सकता हूँ कि आखिरी बार प्रेम कहाँ देखा गया था
और मैं गीता में हाथ रखकर कसम खाकर कहता हूँ,
"मैंने सेल्फ डिफेंस में किया खून."
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(3)

नब्ज़ काट लेने दो
कि सौ साल का हूँ मैं
सरकारी तफ्तीशों में मेरी आत्महत्या 'एक नैसर्गिक मौत' मानी जायेगी
जबकि टेक्नीकली कोई भी मृत्यु नैसर्गिक नहीं होती
कोई सांस लेना यूँ नहीं भूलता जैसे मजदूर भूल जाता है कान में रखी बीड़ी.
मरना एक आदत है
ढेर दोहरावों से भरी
'इतिहास अपने को दोहराता है' इस जुमले की तरह
मैं नौ माह के गर्भ काल के बाद फ़िर-फ़िर जन्मा हूँ
मेरे अतीत से जुडी हुई नाड़ी फ़िर-फ़िर अलग की गई
स्टेरेलाइज्ड सीज़र से.
तो
नब्ज़ को काट लेने दो,
ये आत्महत्या नहीं आत्मजन्म है गोया.
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(4)

छिः ! कैसी कविताएँ लिखते हो कहा तुम ?
न कोई सिर न पैर
न अर्थ, न उद्देश्य
न प्रेरणाएँ न अवसाद
न भाव कोई न चमत्कार
न कोई आर्थिक लाभ इनका न सामाजिक सरोकार
न लेफ्टिस्ट न आशावादी
न प्रेम न फलसफे !
...क्या लिख रहे हो अब ?
ओहो ! 'ज़िंदगी' ?
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(5)

ये दुनियाँ परिष्कृत हो रही है
इसलिए धीरे धीरे नष्ट हो रही है
बारूद के ढेर में नहीं ज्ञान के ढेर में बैठी है
पागल होने का नहीं इसके बुद्धिजीवि होने का खतरा है ।
पागल एक वक्त में एक ख़ून करता है ।
जिसे तुम देशद्रोह कहते हो उसे पागल भूगोल समझते हैं ।
जिसे तुम धर्म कहते हो उसे युद्ध और जिसे युद्ध कहते हो उसे धर्म समझते हैं ।
राजनीति तुम्हारे लिए एक बड़ी खूबसूरत चिड़िया है,
पागल उसकी चोंच में बिलबिलाते कीड़े देखते हैं ।
'समाज' तुम समझाते नहीं उन्हें, और 'क्राँतिया' वो समझना नहीं चाहते ।
इंसान तुम समझा नहीं पाते उन्हें
जिसे तुम प्रेम कहके समझाते हो उसे समझ ही नहीं पाते ।
तुम्हें पागलों से कोई खतरा नहीं क्यूँकि वो देवालयों में भी उतना ही नहीं जाते जितना गुरुद्वारे में ।
दोनों जगह लंगर बाहर लगते हैं और पेट भर जाता है ।
पागल अपने छोटे छोटे पत्थर भी जेबों में छुपा लेते हैं ।
तुमको दिखेंगे तो तुम कविताएँ कहकर मज़ाक बनाओगे ।

बुधवार, 13 जून 2012

तीस साल का सामान्य आदमी, सामान्य आदमी नहीं होता

अपने को अपने सामने सामान्य सिद्ध करने को,
दोस्तों से बात करते वक्त अनगिनत बार बोला 'भो...' और 'मा...'
चुस्कियां लेते हुए...
सिग्नेचर के दो थर्टी एम. एल.पैग लगाये
...वन फ़ॉर मेडिसन, टू फ़ॉर इंजॉयमेंट .
पैंतीस पन्ने पढ़ चुकने के बाद
फ़िर उठाई 'मेटामॉरफोसिस'.
स्खलित होते वक्त
उस बदसूरत स्त्री से कहा,
"मैं तुमसे असीम प्रेम करता हूँ"
और इस तरह
तीन घंटे में तय किया,"अब मैं शादी शुदा हूँ" से लेकर
"ये सब 'उनको' पता लगा तो" तक का विमेन-साईकोल्ज़ी वाला सफ़र.
ऑनलाइन बुक किये विक्की डोनर के मूवी टिकट.
तुम्हें याद किया और प्रेम को कोसा.
पुरानी वालियों को उनके पतियों  के सर नेम के साथ सर्च किया फ़ेस बुक में.
सिगरेट पीकर जलाई नयी चादर.
ऑटो वाले को
"उसी के घर में घुसकर मारने"
की धमकी दी.
देखीं फटाफट चालीस खबरें और अन्ना या कांग्रेस में से किसी एक का पक्ष लिया.
लोकल चैनल देखते हुए जगा रहा देर तक किसी इरोटिक सीन के इंतज़ार में.
चिपकाए रहा जाती हुई लड़कियों के क्लीवेज में अपनी अतृप्त नज़रें.
यूँ सोचा आदमी और घोड़ा कभी बूढ़े नहीं होते.
धुला बर्तन चुना मैग्गी बनाने को और कल (या शायद परसों) वाले बर्तन में बनाई चाय.
कॉलेज के दोस्तों से फ़ोन में कहा कि मा... सारी लड़कियां (औरतें नहीं) एक सी होती हैं,
(...दोस्तों से बात करते वक्त फ़िर अनगिनत बार बोला 'भो...' और 'मा...')
सस्पेंस नॉवेल का सीरियल किलर पहले ही गैस करके किया सस्पेंस 'किल'
शेविंग उल्टी की.
और इतना सब कुछ करने के बाद भी जो कुछ नहीं कर पाया उनके लिए कहा...
..ये सब तो हम कर के छोड़ चुके बेट्टा !
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तीस साल का आदमी अपनी हर काल्पनिकता सत्य के धरातल में पटक पटक कर तोड़ता है और फ़िर उसकी बाकी बची उम्र उन टूटे हुए टुकड़ों को सजोने में बीतती है....
१) पैसा सबसे जरूरी नहीं पर बहुत जरूरी है.
२) हेल्थ इंश्योरेंस में सिगरेट डिक्लेयर करनी है.
३) इश्वर होता है इसलिए मंगलवार को नॉन वेज नहीं खाना चाहिए.
४) शादी से पहले एक बार रौ-सेक्स से एक्सपिरियेंस आ जाएगा.
५) इस उम्र तक कुछ तो बैंक बैलेंस होना ही चाहिए था.
६) औरत को समझना मुश्किल नहीं है.
७) पुरुषत्व का मतलब लड़कियों के दिल में नहीं क्लिट में गुदगुदी करना होता है.
८) आत्महत्या की सोच बड़ी ही अपरिपक्व होती है.
९) इट्ज़ टू अलरी टू गिव अप.


मंगलवार, 15 मई 2012

Random Thoughts Continued

नहीं देखीं कई दिनों से तितलियाँ,
पर सुना है अंधे भी प्रेम कर सकते हैं.
अपने होने पर शर्म तो कभी महसूस नहीं हुई,
क्यूंकि प्रकृति ने ही चुना था मेरे होने को.
सृष्टि ने ही मुहर लगायी थी वर्तमान की मुझमें.
किन्तु फिर भी...
क्षमा प्रार्थी हूँ सारी सृष्टि से,
अपने किये के लिए....
एक छोटे से सुख के लिए,
अनंत काल का दुःख, दुःख नहीं लगता....
...लम्बा इंतज़ार सच को अनंत से गुना करता है.
इश्वर कोई नहीं है...
...बस आप हैं.
नहीं ! आप इश्वर नहीं हैं, बस आप 'आप' हैं.
हर पीड़ा में आप हैं,
हर सुख में आप हैं,
हर पीड़ा की मुक्ति के प्रयास में आप हैं...
हर सुख की तलाश में आप हैं.
सो,
आइये इश्वर को नकारें...
...जब तक की वो हमें मिल नहीं जाता.
आइये प्रेम स्वीकारें...
...जब तक की वो हमसे खो नहीं जाता.
आइये मृत्यु नकारें...
...जब तक की वो हो नहीं जाती.
(वैसे मृत्यु कभी नहीं होती, कौन मरा है भला  आज तक?)
तो आइये होना स्वीकारें...
..कम से कम वर्तमान तक.



गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

किसी चर्च और किसी कैसिनो में प्रार्थना करने में केवल इतना अंतर है की कैसिनो में आप 'वास्तव' में प्रार्थना कर रहे होते हैं.


मैंने देखी है वर्तमान इश्वर की सार्थकता,
वो कम से कम,
"यहाँ पेशाब करना मना है" या
"नो स्पिटिंग"
वाले जुमले से तो अधिक ही कारगर है.
ये इश्वर ही हो सकता है,
जो जिंदगी दे सकता है आपको,
धार्मिक वैमनस्य में बिन ब्याही माओं के गर्भ से भी.
और ले भी सकता है,
ऐसे  ही किसी दंगे में,
बिना कोई कारण बताए.
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अफीम और उन्माद के नशे में वे लोग कत्ल, बलात्कार और छीना झपटी जैसे  अपने क्लासिक-इन्सटिंक्टस भूलकर  अबकी पैगम्बर बन बैठे हैं,
वो  'चिल्ला-चिल्ला' के कह रहे हैं शांत हो जाओ,
शांत हो जाओ, और लाइन लगा के खड़े हो जाओ थोड़ी ही देर में आपके गले काटे जाएंग.
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सुनते हैं कि धर्म तो अवसादों, दुखों और पीडाओं से बाहर निकलने का पासपोर्ट होता है,
ये इश्वर तक पहुंचने का वीज़ा कब हुआ न जाने?
वो कौन सा कॉमन-वीज़ा है जिससे ऑस्ट्रेलिया, अफगानिस्तान और गुजरात में समान रूप से स्वच्छंद घूमा जा सके?
और  वो कौन सा सम्प्रदाय है जिसमें या जिसको अपनाकर, 
मेरी इस कविता को बिना किसी प्रिज्यूडिस के पढ़ा जाएगा?
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मैंने ज्यादा कुछ नहीं पढ़ा,
न ज्यादा कुछ जानता ही हूँ.
क्या आप में से कोई बता पायेगा मुझे,
किस खुदा को मानकर चिड़ियों का चहचहाना अधिक मुग्धकारी होगा?
कौन सा इश्वर मेरे 'ऊँचाई से गिरने के भय' को सच में समाप्त कर देगा?
यकीनन अतीत में कोई ऐसा काइंड-रिलीजन, ऐसा मोडएस्ट-सम्प्रदाय और ऐसा सॉफ्ट-खुदा रहा होगा,
और कालान्तर में वो ऑनर किलिंग के स्लो पोइजन का शिकार हो गया होगा,
बट ऑव्यस !
और अब, धर्म के नाम पर जो भी बाकी रहा वो केवल शक्तिशाली है बस
ऐसा कोई जो हमारी रक्षा करता है,
और उसके एवज में हफ्ता देना पड़ता है उसे.
हमने उसकी रक्षा करनी चाहिए थी जब वो थोड़ा थोड़ा नष्ट हो रहा था,
पर तब,
तब शुक्र है, हम अपने को थोड़ा थोड़ा बचा ले गए.
मांडवाली करके.
मुझे लगता है उस लुप्त हुए इश्वर के 'फोसिल्स' हमारे अंदर कहीं अब भी दबे पड़े हैं.
वो 'धर्म' जिसका डी. ऍन. ए. किसी मच्छर के खून से नहीं निकाला जा सकता.
उसकी  कला हमें किसी मधुमक्खी से सीखनी होगी.
और जिस दिन ये कला आ गयी,
मुझे लगता है तब चिड़ियों का चहचहाना अधिक मुग्धकारी होगा.
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बहरहाल मैं मतलबी हूँ और जिंदा रहना चाहता हूँ,
मुझे पता नहीं क्यूँ ये लगता है,
किसी भी धर्म का व्यक्ति मेरा कत्ल करेगा मुझे एक बराबर दर्द होगा.
मेरी मौत एक बराबर मौत होगी.
और मुझे डर है उस वक्त दब कर न रह जाये ,
अल्लाह हो अकबर या जय श्री राम के उदघोष के बीच मेरी मदद की पुकार.
तो, अगर किसी धर्म में 'अहिंसा' और 'सद्व्यवहार' बोल्ड लेटर में लिखे मिलें मुझे,
तो मैं उसके ठीक विरोधी धर्म अनुयायी बनना चाहूँगा.
टू बी ऑन अ सेफर साइड.
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जब वो मेरा कत्ल करेंगे,
मैं उनको कोई धार्मिक उपदेश नहीं दूँगा,
जैसे कि,
"आप गलत कर रहे हैं." या,
"आपका खुदा, इश्वर या वाहे गुरु भी नहीं चाहता आप ऐसा करें."
इन्फेक्ट मैं उन्हें बताऊंगा सीधा सा गणित कि,
एक से भले दो होते हैं,
और मुझे 'बाल कटवाने' या 'खतना' करवाने में मर जाने से कम दर्द होगा.
मैं मतलबी हूँ, जैसा मैंने पहले भी कहा
और मैं जिंदा रहना चाहता हूँ,
बेइज्जत होकर खुदा बदल कर या जिंदगी भर बाल न कटवाकर
जैसे  भी.
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क्षेपक : यदि आपका इश्वर मेरे इश्वर से अधिक शक्तिशाली है या वाइस-वर्सा तो उन्हें आपस में लड़कर ये सिद्ध करना चाहिए अब. 
वन-ओ-वन !  
हमारे कहने से कुछ नहीं सिद्ध होना. न हमारे 'ऑन बिहाफ ऑव'  लड़ने से. खामख्वाह !

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

...हेंगओवर अनप्लग्ड !

उन कुछ गिने चुने लोगों के लिए

दोस्तों,
हम अलग तरह के लोग हैं,
समाज 'को' बहिष्कृत किये हुए.
चिर निद्रा में हैं,
स्वप्न में, जो वास्तविकता से अधिक सत्य हैं.
एक ही समय में वक्त से इतने पीछे और इतने आगे,
कि हमेशा समकालीन.
विरह की विरचना के लिए प्रेम करने वाले.
इतने आत्मकेंद्रित कि बीसियों बार 'सर्वे भवन्तुः सुखिनः' का जाप करने वाले.
इतने दोगले कि दोनों पक्षों के विश्वास पात्र.
हम बस सोचने वाले लोग हैं,
कर कुछ नहीं सकते हम.
इसलिए सोचते हैं,"करने से क्या हो जाएगा?"
हर संभव चीज़ को इतना असंभव किये हुए हैं हम अपने लिए कि,
असंभव भी 'बस' संभव के समतुल्य ही असंभव है हमारे लिए.
हमारे विचार पैराडॉक्स से उत्पन्न लोजिक हैं.
चीजों के इस हद तक विरोधी, इतने रिबेलियन कि,
हर चीज़ की सुन्दरता 'एज़-इट-इज़' में स्वीकार्य है हमें.
इतने बंधनों में कि पूर्णतया मुक्त.
जीत जाने को इतने उत्सुक कि हर हार के बाद भी अति उत्साहित.
(इतने ज़्यादा हतोत्साहित कि, हमेशा उत्साह से भरे हुए.)
इतने डरे हुए कि, निडर.
हर इन्सान में कोई ना कोई खूबी होती है,
हमारी खूबी है कि हम रो सकते हैं 'ख़ुशी-ख़ुशी'
दोस्तों,
हम अलग तरह के लोग हैं,
कि हम मृत्यु से पहले मर चुके है कई बार,
इसलिए आनंद में हैं जीवन के.



इशिहारा टेस्ट: यदि आपको उल्लिखित कविता में ढेर सारे विरोधाभास दिखते हैं तो खुश हो जाइए कि आप अब्नोर्मल नहीं हैं.

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

अवसाद का डाटा-बेस

12-08-2011
तुमको (तुम्हारे लिए नहीं) कुछ प्रेम कवितायें लिखनी थीं, पर जो मेरी मौलिक होनी थीं वो तो पहले ही लिखी जा चुकी हैं.
"तुमको चाँद सा कहना, तुमको चाँद कहना, तुमको चाँद ना कहना, चाँद को तुमसा कहना, चाँद को तुम कहना, तुमको चाँद से बढ़कर कहना..."
अच्छा क्या ये भी कहा जा चुका है की "चाँद बस तुमसे थोड़ा ही ज़्यादा खूबसूरत है?"
"मुझे भूल जाना, मुझे याद रखना, मैं वापिस आऊंगा, मैं वापिस नहीं आऊंगा, तुम बुलाओगी तो मैं सात समन्दर पार से भी आ जाऊँगा, तुम बुलाओगी तो भी मैं नहीं आऊंगा."
मुझे तो ये भी लगता है कि शायद ये भी पहले कोई कह चुका है "बुला के देखना पर पहले भूला के देखना."
...हो सकता है, हो सकता है क्या यकीनन कई नई सारी बातें प्रेम में कहनी बाकी हैं अभी. पर 'प्रेम' ना बदला है ना बदलेगा, प्रेम वही है...
वही...
...वो, पुराना वाला !
कितनी अच्छी बात है ना?
मैं नहीं जानता कि 'आई लव यू' को कितने अलग तरीकों से, कितनी अलग भाषाओं कितनी अलग बोलियों में कहा जा सकता है. एक गाना था, फ़िर एक फोरवरडेड मेल भी . और ये दोनों बातें तुम्हें पहली बार 'आई लव यू' कहने से पहले की हैं.
लेकिन  जैसे वो 'एफ. आई. आर.' धारावाहिक की लड़की यूनिफ़ॉर्म में ही सबसे बेस्ट लगती है, वैसे ही (मुझे) आई लव यू, 'आई लव यू' में ही बेस्ट लगता है.
आरती का मतलब जानती हो? पूरी पूजा में जो भी त्रुटियाँ रह जाती हैं,उनका भू.चू.ले.दे., पूजा की कोई विधी ना जानूं जैसा कुछ..
आई लव यू दरअसल नायिका की आरती है.
तुम कहती हो कवि होकर प्रेम कवितायें तो छोड़ो प्रेम के दो शब्द नहीं लिख सकते?
ओ पागली ! ये प्रेम करने की उम्र है, लिखने की नहीं. उसके लिए 'खुशवन्त सिंह', 'गुलज़ार' और 'जावेद अख्तर' हैं ना...
कई लेखक बड़े 'जेनुएन' होते हैं, अपनी आप बीती अपनी मनः स्थिति लिखते हैं, अपना जिया लिखते हैं, पर कुछ लेखक मुखौटा धारी होते हैं, नकली, दोगले मेरी तरह. अगर मैं  लेखक हूँ तो. (वैसे तुम कहती हो मुझे 'लेखक' मैं तो मानता भी नहीं.)
अभी प्रेम कवितायें लिखने से इसलिए भी कतराता हूँ कि अगर आपनी कविता की नायिका के होठों, केशों या बाहों से थोड़ी इधर उधर भटका तो लोगों को लगेगा (मुझे लगेगा कि लोगों को लग रहा है, क्यूंकि ये सच है/होगा) कि वो नायिका तुम हो.

I don't want anybody to think about you in the samy way as I do, Rather I don't want to think that somebody is thinking about you in the same way as I do.

तुम कहती हो तुम नहीं होगी तो मैं प्रेम कवितायें अच्छी लिखूंगा. मैं कहता हूँ, "ग़लत" !
क्यूंकि जब तुम नहीं होगी तब भी प्रेम तो होगा ही. हाँ एक वक्त ऐसा आएगा कि मैं प्रेम से विरक्त  हो जाऊँगा(उस विरक्ति के लिए बुढ़ापा जरूरी नहीं बता दूं तुम्हें). तब शायद....
...यानी जब भी तुम्हें लगे कि मैं प्रेम कवितायें अच्छी लिख रहा हूँ  तो जान जाना जानाँ की मेरे जीवन में अब प्रेम कहीं नहीं है.

अभी तो मुझे क्रांतियों के बारे में लिखने दो, क्यूंकि मुझे रोड क्रॉस करने का फोबिया है.
अभी मुझे उस गरीब भिखारी बच्चे के बारे में लिख लेने दो, क्यूंकि मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सकता. (घृणित है पर लेट मी एक्सेप्ट 'करना भी नहीं चाहता.')
अभी मुझे आत्महत्या का मनोविज्ञान पे 'थोथा चना' लेख लिख लेने दो, लिख लेने दो मुझे 'मोक्ष प्राप्ति' कि विधियां, क्यूंकि मुझे तैंतीस करोड़ योनियों में भटकना ही है.
लिख लेने दो मुझे इतिहास क्यूंकि वो बदला नहीं जा सकता, लिख लेने दो मुझे भविष्य क्यूंकि वो यक़ीनन वैसा नहीं होगा जैसा मैं लिखूंगा. मुझसे वर्तमान लिखने को मत कहो प्लीज़...
जी लेने दो मुझे वर्तमान, कर लेने दो मुझे प्रेम.
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पुनःश्च आई लव यू !



13-08-2011
तुम्हारा थक जाना,
मेरी हार में हुए सत्यापित हस्ताक्षर हैं.
हार जाने,
और हार स्वीकार कर लेने में,
तुम्हारे थक जाने का अंतर है.



14-08-2011
ये पन्ने इन शब्दों के लिखे जाने से पहले खाली थे,
इनपे कुछ और भी लिखा जा सकता था,
बिल्कुल अलहदा...
राशन का सामान,
महीने का हिसाब,
और लिखी जा सकती थी इनमें कविता.


15-05-2011
गल्तियाँ तुम्हारी होतीं तो तुम्हें अपनाना,
इक एहसास-ए-सुकून-ए-एहसान होता,
पर मेरा कितना बड़ा दिल है देखो,
मैं अपनी गल्तियों के बावजूद,
तुम्हें अपनाना चाहता हूँ.
बॉल इज़ इन यौर कोर्ट नाऊ...


16-05-2011
अच्छा साहित्य 'आपदाओं' की नहीं, 'संगठित आपदाओं' की देन है, क्यूंकि वो 'सर्वजन दुखाय' है.
बिहार एक संपन्न राज्य है जिसमें गरीब लोग रहते हैं, उसी तरह ये समय सृष्टि के प्रारब्ध से अब तक का सबसे शान्त समय है जिसमें कुछ छोटे छोटे एक्सट्रीम विभत्स पल हैं, सृष्टि के प्रारब्ध से अब तक के...
और उनकी संख्या लाखों करोड़ों में है,
'फूट डालो राज्य करो' का ग्राफ देखा है?
दो में बाटों, चार में, सोलह, चौसठ.... ....लाख, करोड़ और...
...राज करना और आसान...
और आसान.
आश्चर्य जनक रूप से फूट भी दुखों में पड़ी है, और राज भी दुःख कर रहे हैं.
दर्द, दुःख,अवसाद सबको है किन्तु एकाकी....
साहित्य की पेंसिलीन, 'दंगों', 'क्रांतियों' और 'वैश्विक-परिवर्तनों' के लिए है.
इसलिए अभी तो 'डिस्प्रीन','क्रोसीन','इनो','पुदिन-हरा' जैसे विचार,लेख,कहानियाँ,कवितायें हैं बस.
हाँ, कुछ रूमानी गीतों,गजलों की 'स्लीपिंग-पिल्स' भी.
ये सब जरूरी हैं, ये सब समय की मांग हैं, 'मुन्नी' , 'शीला' और 'रज़ियाओं' के 'पेन किलर' की तो सबसे ज़्यादा.
अभी आवश्यक है बहुत कुछ लिखा जाना, आईटमाइज्ड पर टेलर मेड.
स्पेक्ट्रम विशाल है अवसादों का, इसलिए कोम्पेक्ट कम.
वोल्यूम इज़ इन्वर्सली प्रपोश्न्ल टू डेंसिटी.
किसी एक्सटेंडेड वीकेंड में मिनियापोलिस या बाल्टीमोर के अपने सब-अर्ब घर के बैकयार्ड में चिकन बार्बैक्यु करते इन्सान के दुःख किसी सामान्य परिस्थिति में ठीक उतने ही लगते हैं जितने रोहतक बाई पास के किसी ढाबे में बैठे, बारह घंटे ट्रक चलाने के बाद बुनी हुई चारपाई में 'नारंगी' पीते, मुर्गा फाड़ते इन्सान के.
ठीक बराबर, दशमलव के चार स्थानों तक शुद्ध नापने के बाद भी. पर इकाई अलग है और इसलिए रिलेट नहीं हो पाते. दुखों की इक्वेशन में एक दूसरे को एक्स आउट नहीं कर सकते.
इसलिए जब कहानी लिखने की सोचता हूँ तो फंस जाता हूँ, परेशानियों के पंचतंत्र में, अवसादों के अलिफ़ लैला में.
और अन्त में अपने अवसादों के बारे में लिखकर सो जाता हूँ या सोने की कोशिश करता हूँ. हाँ हाँ में मतलबी हो गया हूँ, पर मतलबी होकर भी खुश नहीं हूँ, भगवान कसम.
बहरहाल....
"सर्वे भवन्तु सुखिना."