मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

संवेदनहीनता

वो,
अपने सर को खुजाती.
बारी बारी
अपने दोनों हाथों से.

उसके मुख से,
सुनी थी भद्दी गालियाँ,
शायद,
उनकी कोई...
'सामायिक सार्थकता'
हो?

गोद में पकड़े...
अबोध जीवन,
नंगा अबोध जीवन

नहीं,
नग्न कहाँ था वो?
पहन रक्खे थे,
उसने,
काले कपड़े.

इसमें...
और,
महाराष्ट्र के चुनाव में,
क्या सम्बन्ध हो सकता है?

नही सोचता हूँ मैं.

पकड़ा देता हूँ उसे,
दस का नोट.

ये 'गाँधी' भी,
उससे खर्च हो जाने हैं.
हेतु,
एक चाय,
और बासी बंद.

उस फ्लाई ओवर से,
गुज़र जाता हूँ.

...एक
...नही दो आवाजें,
रुदन की.

एक आवाज,
जो अब तक पकी नहीं थी...

मैं?
वापस?
नहीं.
इंडियन आइडल ?
और फिर,
पिज्जा ?

वहीँ से कामना,
........
हे इश्वर...
न हो ये !

...कल के अख़बार में भी,

कुछ न पढूंगा....
पेज थ्री के सिवा.

फिर से,
झुठला दूँगा सत्य.

28 टिप्‍पणियां:

  1. satya se moonh nhi mod sakte hum magar modna chahte hain......gahan anubhuti

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  2. दर्पण जी,

    काश कि हम यह सत्य झुठला पाते?

    बहुत अच्छी कविता।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  3. Bachwa,
    CHAAHNEY aur KARNEY mein yahi fark hai...
    Jo ham CHAAHTEY hain wo ham KARTEY nahi
    aur jo ham KARTEY hain wo ham CHAAHTEY nahi..

    aur isi jhol mein kat jaati hai zindagi..
    jeete raho..
    aDaDi

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  4. फिर से,
    झुठला दूँगा सत्य.
    झुठलाये गये हर सत्य फिर से हमारे सामने खडे हो जाते है.

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  5. दर्पण शाह जी सुन्दर रचना

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  6. झकझोरती बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना....बहुत ही अच्छा लगा पढना.....आभार आपका..

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  7. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति । अंत ने खासा प्रभावित किया दर्पण भाई । धन्यवाद ।

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  8. अफ़सोस के सच का नहीं होता खूबसूरत चेहरा ...

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  9. इसमें...
    और,
    महाराष्ट्र के चुनाव में,
    क्या सम्बन्ध हो सकता है?

    नही सोचता हूँ मैं.

    पकड़ा देता हूँ उसे,
    दस का नोट.

    ये 'गाँधी' भी,
    अन्दर तक हिला देने वाली अभिव्यक्ति!

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  10. आपकी रचनायें कमाल की होती है, बहुत सुन्दर ।

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  11. फिर से झुठला दूंगा सत्य ...इसी तरह ख़ुशी ख़ुशी जिया जा सकता है ....
    है ना ...
    सोचने पर विवश करती रचना ..!!

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  12. शायद पहली बार मेरे ब्लॉग पर आये थे तुम दर्पण...

    जो कमेन्ट में यही कविता लिखी थी तुमने...एकाध मामूली सा फेर बदल लग रहा है शायद...

    कितना समय हो गया है न...?
    कहाँ झुठला पाए तुम...?

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  13. सत्य सदा खूब्सूरत ही होता है, जो आप बदसूरत देखते हैं वह उसमें आपका ही चेहरा होता है,ज़नाब । भाई,यदि सच को झुठलाने की बात कहते हो तो’हे ईश्वर! क्यों? वह तो सत्य ही है। विरोधी भाव क्यों, क्योंकि वस्तुस्थिति के कारण पर सोचने की किसी को फ़ुर्सत नहीं, बस देखा, सुना, सुनाया चलदिये।

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  14. ये 'गाँधी' भी,
    उससे खर्च हो जाने हैं.
    हेतु,
    एक चाय,
    और बासी बंद.एक ऐसा सच जिसे देखता तो हर कोई है रोज़ रोज़ और महसूस भी करता है मगर कह केवल कोई विरला ही पाता है उन विरले लोगों का दर्पण हो तुम । मगर सत्य को तुम भी नहीं झुठला सकते दर्प्न हो ना इस लिये बहुत सुन्दर कविता है बधाई और आशीर्वाद्

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  15. darshan,

    is rachna ne ek baar fir mujhe apana ek ateet yaad dilayaa\
    aapne bharat ki tasveer ko chnd shbdo me pesh kar diya/ yahi to khasiyat he aapki/ aapki kalam jin samvednao ki laharo pe savaar hokar saahil se takaraati he to apne thos nishaan ankeet kar jaati he/ rachna ki saarthakta yahi hoti he/
    " sir ko kujana parshaniyo ke beech khud ko sthir karne ka asafal pryaas mana jaataa he, agar sir me ju naa ho to/ jis sandarbh me yah rachna likhi gai he, usame abodh tathaa, viraat bhavishya ki pareshani chhupi hui mujhe lagi/
    bhaddi gaaliyo ki saarthakta he.., yah bhi kuntha ko bahaa dene me saarthak hoti he/ aaj janmanas bhi to kunthit hota jaa rahaa he/ jeevan abodh hi to hota he/ ekdam nangaa/ ham us par samaaz ke, raajniti ke paridhaan chadaate rahte he, kintu yathaarth me vo nangaa he/ ekdam nangaa saa/ kisi raajya ke sandarbh me sateek teekaa..kaale kapado ki tarah nepathya me chhupaa huaa satya he/ aour jo 10 ka not diya jaa rahaa he, vo mahaj ek pal ki santushti he..dono ki/ jo le rahaa he, jo de rahaa he/ kintu bhavishya andhkaar hi ek matra stya he/
    samaj pag 3 me simata jaa chukaa he/ chahe gareeb, anaath, ameer..sab ko usi pag 3 ki aag he/ aag hamesha raakh kartee he/ bharat ka pg3 sanskaar raakh hi to karegaa////aap jhuthalaa sakte ho magar stya to satya he, fir jhuthlaanaa bhi kesa..jisake pichhe hamesha yahi chhupa ho ki satya to satya he, mene sirf use nazarandaaz karne ki ek asafal kosheesh bhar ki he/

    darpan, bahut sundar rachna ke liye fir se bahut saaari badhaai\

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  16. दर्पण जी आपकी कलम तो गहराती ही जा रही है....हम सरल ,सीधा लिखने वालों पर कुछ तो रहम करें....

    Asusal wonderful !!

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  17. मैं?
    वापस?
    नहीं.
    इंडियन आइडल ?
    और फिर,
    पिज्जा ?

    वहीँ से कामना,

    सही है दर्पण भाई सही है
    वेवलेन्थ्स मैच होती जा रही हैं अपनी..रेसोनेन्स बस समय की बात है
    वैसे मैं सोच रहा था कि क्या आपने इसे थोड़ा और एक्स्पैन्ड करना चाहा होगा?..या कम से कम आत्मचिन्तन की पोस्ट्मार्टम टेबल पर कुछ शिरायें/अंग तो फ़ंसे होंगे..चेतना के चाकू की धार पर..जैसे जुबान का गाली भरा भदेसीपन..निर्धन नग्नता की कुरूपता..या फिर अपना-अपना-भाग्य टाइप शाश्वत प्रारब्धमीमांसा..
    वैसे मुझे लगता है कि हमारए श्वेत-शर्ट धारी सौन्दर्यबोध और तमाम साहित्यिक-पाखंड से तो दस के नोट के गाँधी भले हैं..कम-स-कम एक वक्त का पेट तो भर सकते हैं किसी का..
    और हाँ बस सोच रहा हूँ कि

    इसमें...
    और,
    महाराष्ट्र के चुनाव में,
    क्या सम्बन्ध हो सकता है?
    मगर फिर याद आता है कि..
    कुछ न पढूंगा
    पेज थ्री के सिवा.

    फिर से,
    झुठला दूँगा सत्य.

    बड़ी गहरे तक कुरेदने वाली रचना

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  18. और आपका यह उद्धरण
    Q:Difference b'ween quality and quantity?
    A:Difference b'ween Aproov and Darpan.

    आपके लिये आपके विनम्र-भाव का सिग्नेचर स्टाइल हो सकता है मगर मेरे लिये तो विचलित करने वाला एक क्रूर मजाक है बस..और वो भी किसकी तरफ़ से ?..एक उधारखाते वाले संदूकधारी,नॉस्टलिजिक नज़्म मे उल्झे , चाँद मे diminishing magrinal utilities का अध्ययन करने वाले योगभ्रष्ट (so called)की तरफ़ से जिसकी आँखो मे खून होने के बावजूद जो चुटकी मे दानिशमंदी का दरिया पार करता हो..जोक ऑव द मन्थ.
    भाई हमारे आदिम P1 टाइप दिमाग की स्लोनेस के बार मे आपको पता ही है..फिर आप जैसे महान काव्यधनी ब्लॉगर्स के द्वारा रोज-रोज नये पोखरन करने वालों की वजह से बचा-खुचा समय दरिया मे गोते लगा कर वाह-वाह करने मे ही निकल जाता है..सो कहाँ से लिखूं..यह तो सरासर जुल्म है..
    खैर आपकी डाँट से डर कर अपने ब्लॉग को आपने कबाबरोल मे कुछ ऊपर खिसकाने के कोशिश की है..
    चलनी और सुई की तुलना अच्छी लगी..खैर अब आप समझ ही गये होंगे कि प्रिविलेज्ड क्लब का कौन सी ओ ओ और कौन सी एन ओ (चलताऊ नॉनऒपरेटिंग ओब्जेक्ट) है? ;-)

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  19. आह! बहुत अच्छा. कल से पढ़ूँगा सिर्फ पेज थ्री...

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  20. बहुत ही सहजता से अन्दर तक बिचलित कर गयी आपकी ये कविता.
    कहाँ से कैसे आते हैं इतने गहरे विचार आपके मानस पटल पर, और कितनी तारतम्यता से परोस जाते हैं जिन्हें आप हम सब को पढ़ने और देर तक समझते रहने के लिए?

    हार्दिक बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  21. फिर से आना पड़ा कविता को पढ़ने के लिये और पढ़ने के बाद जितनी तेजी से गुजरना चाहता हूँ उस फ़्लाइओवर से रुदन की आवाज उतनी ही तेज सुनाई देने लगती है..अच्छा है कि न्यूजपेपर मे कोई रुदन या चीख रेकॉर्ड नही होती हैं..और फ़र्स्ट पेज से पेज थ्री तक पलटने मे किसी फ़्लाइओवर पार करने से कम समय लगता है..कितनी आसानी से हम अपने लिये एक सुविधाजनक दुनिया गढ़ लेते हैं..और उसके खुदा बन बैठते हैं...
    जितनी बार पढ़ता हूँ उतनी ही निख्ररती सी जाती है कविता..
    इतना अच्छा लिखने के लिये आपको बधाई.

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  22. फिर से,
    झुठला दूँगा सत्य. jaise jaise pragti ke path pe aage badte jayenge..kyee nye kadwe sach samne aayenge...fir kis kis ko jhutthlayenge????

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  23. Beautiful... after all we are emotionless living in this materialistic world..

    bahut hi pyari composition...

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'ज़िन्दगी' भी कितनी लम्बी होती है ना??
'ज़िन्दगी' भर चलती है...

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