बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

नो हायर रेजल्यूशन अवेलेबल

खोजा गूगल में,
फिर गूगल इमेज़ेस,

अब तुझे ,
ढूँढ रहा हूँ...
गूगल मेप में.


बर्लिन की दिवार,
बाबरी मस्ज़िद का गुम्बद,
बुरका ओढ़े बुद्ध,
किसी 'कथित' तानाशाह की...
कथित मूर्त आत्मश्लाघा
कोई तेल का कुआँ,
मोहनजोदड़ो...
पाकिस्तान वाला भी.
हूवर डेम से पहले की 'लॉस वेगास बाजियाँ',
वो दो गगनचुम्बी इमारतें...
जिसकी सबसे ऊंची मंजिल से...
सभ्यता पूरी दिखती है...
लेकिन...
साफ़ नहीं.

ओ बेवकूफ इंसान,
जामवंत-हीन.
मैं तुझे ढूँढ रहा हूँ,
अब तक...

भूकंप बिन बताए आते हैं,
इसलिए तू भी पूजने योग्य है.

साले !!
अपना कॉपी राईट  करा ले,
कल तुझ जैसे बनना चाहेंगे कुछ,
और तब...
इश्वर से ज़्यादा क्लिक्स,
तेरे हों.

अबे आदमी !!
तेरी इमेज़ को,
इन्लार्ज़ करा के,
प्रिंट स्क्रीन लेना चाहता हूँ,
तेरी वर्चुअल आरती करना चाहता हूँ,
या कोई 'जागर'
सर को गोल गोल घुमा के...

क्रेडिट कार्ड से तुझे भोग लगाऊंगा,
ऑनलाइन.

मैं रिफ्रेश का बटन दबाता हूँ,
पांच बार बैक करके.

18 टिप्‍पणियां:

  1. अभी मुझे रिफ्रेश का बटन दबाने दीजिये स्पष्ट नहीं हो पा रहा ये इंसान ......फिर आती हूँ ......!!

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  2. निशब्द हूँ....ओर स्तब्ध भी .....तुममे शब्दों का उगना देख रहा हूँ ओर भाषा की रवानगी को भी....एक अजीब सी मेचुरिटी भी .....इसे तुम्हारे बेस्ट क्रिय्शन में डालनाचाहूंगा .......
    hats off.....

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  3. यह कविता ज्यादा टाइम मांगती है दर्पण जी... फिलहाल इतना ही कहूँगा बहुत बुद्धिमानी से आपने बात कही है...

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  4. Great..yeh huyi na meri-choice-type kavita! :-)
    actually THIS is what distinguishes Drapan-brand from the rest of blogosphere.

    I can say itz my most favourite one..so far..on your blog (flyover ke paar vaale ke alava)!!!
    baaqi baad mein...

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  5. Doobney se dar lagta hai is liye gehrayee mein nahee gya. Upar upar se jhaank kar dekha toh bahut achchee lagee yeh kavita. Fir aoonga ik baar aur jhankney.

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  6. सिंप्ली ग्रेट ........ दर्पण जी ........ कहाँ से लाते हो ऐसे शब्द और ऐसी रवानगी ........ खिलोनों की तरह शब्दों को जैसा चाहो वैसा रूप दे देते हो ......... कमाल करते ही भाई ...... हमारे गूगल को काश हम रेफ्रेश कर पाते ........

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  7. बहुत मुश्किल है कुछ कहना ....

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  8. हूँ, जो शब्द चाहते हैं उसे लाकर अपनी अभिव्यक्ति के लिये उससे चाकरी कराने लगते हैं । सोचता हूँ, यह सामर्थ्य कैसे आती है । हम तो आदत पड़ गये संबंधों और शब्दों में उलझे हैं । ये रवानगी तो दुर्लभ है ।
    आभार ।

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  9. अरे...!! तुम तो निराला स्टाइल में कविता रचने लगे

    बहुत अच्छा लिखा दर्पण...!!

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  10. darshanji,.\
    me ab kahne lagaa hu, apne mitro se, yaa kabhi jab kisi mandali vagera me hota hu yaa fir kanhi jab koi ekdam se apne saath hotaa he..yaa unhe jo sahity ko samajhte he..ki kavita me tezi se krantikaari badlaav aa rahe he, yah badlaav..koi bebuniyaad nahi he, balki kavitao ko disha dene vaale he,,yah nishchit roop se sukhad badlaav he, aane bhi chahiye, kyoki yah samay ki maang he, aour is badlaav me 'darpan' ko me avval sthaan par rakhtaa hu, koi atishyokti nahi he.../
    mujhe maza aataa he, me padhhne kaa bahut badaa keeda hoo, so jab bhi koi rachna mujhe prabhavit karti he to me apne aap ko rok nahi pataa, use apni notbook me likhataa hu, uske rachnakar se sampark karne ka pryatn kartaa hu, usase..samvaad sthaapit kartaa hu.., jitna ban sake, utna...,
    prastut rachna me aapne yathaarth ko khadaa kar diya he.bhavishya ke samket he, aour lagbhag usaka parinaam bhi.../

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  11. रचना में शब्दों की इतनी सरलता है फिर भी छिपे भावों की गहराई को नापा नहीं जा सकता.कई माने निकलते है कविता के.क्या इंसान को गूगल क्लिक करके ढूँढना पड़ेगा?लुप्त हो गयी डोड़ो(बेचारा) की परजाती की तरह.
    या इक ऐसे इंसान की बात है जिसके नाम भर को गूगल में भरना होगा और बस...
    कतार वही से शुरू होगी चाहे वो किसी कतार में न भी होना चाहे.
    जामवंत हीन इंसान
    यहाँ मैं कवी से सहमत नहीं
    तुम्हारे अंदर अनंत शक्ति का स्रोत है,पास जाओ खुद के जगाओ खुद को कोई और जामवंत नहीं आने वाला.

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  12. aaj to shabd dhoodne se nahi mil rahe hai

    kayamat hai.


    kamal hai.

    kaha se milete hai ye vichar.

    kamal ki rachana.

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  13. सुना है गाँव जा कर कुछ बेहद उम्दा गणर्जन कर आये हैं आप... दिल्ली से दूर जा कर लोग ऐसे ही कवितायेँ रचते हैं... बुध्धिमानी भरी...

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  14. at times i feel totally at loss of words..and these days most of the times when i read something written by you...

    साले !!
    अपना कॉपी राईट करा ले

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  15. मुश्किल है बहुत मुश्किल...
    चाहत का भुला देना.........

    चाहत का भुला देना....

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  16. आज आगे नहीं साहब...अब इसे रिवाइंड मोड में पढना है.

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'ज़िन्दगी' भी कितनी लम्बी होती है ना??
'ज़िन्दगी' भर चलती है...

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