शनिवार, 5 जुलाई 2014

फेसबुक भी उतना ही वर्च्युअल है जितना जिंदगी

जब से तुम जानते हो तभी से उस चीज़ का अस्तित्व होता है

दर्पण में बनने वाला प्रतिबिम्ब
वहाँ हमेशा ही होता है
कभी कनखियों से देखना
धीरे धीरे दबे पाँव जाकर
उसकी चोरी पकड़ लोगे तुम
तुम पहले से ही मौजूद थे वहाँ

आंसू की पहली बूंद इसलिए मीठी होती है
क्यूंकि उसका स्वाद होठों तक नहीं पहुंच पाता
कभी बस एक बूँद रोकर देखना

तुम जब घर में ताला लगा के घुमने जाते हो
गायब हो जाता है सारा सामान भी
कभी चुपके से बिन बताये आना
कुछ नहीं मिलेगा वहाँ
घर भी नहीं

कभी हुआ है ऐसा कि अनजाने में
तुमने दूसरी ही चाबी से खोल डाला ताला
कितनी ही बार तो हुआ है कि
तुम सोये घर में उठे ट्रेन की किसी बर्थ में
तुमने पूछा फिर तुम कैसे आये यहाँ
और किसी बहाने ने बनाई रखी कंटीन्यूटी

लॉकर में रखा सामान इतनी सिक्युरिटी के बावज़ूद
वहाँ तुम्हारे देखने के बाद ही उपस्थित होता है

तुम जानते हो कि तुम पचासवीं मंजिल से कूद नहीं सकते
इसलिए वहाँ से केवल मरने के वास्ते कूदते हो
वरना लियोनार्डो को कभी चोट न लगती
वरना कीड़े खाकर उड़ने लगती
न्यूटन की बहन

तुमने जाना है समय को
जैसा उन्होंने तुम्हें बताया
वरना तुम्हारे पास जीने के अनंत क्षण होते
तुमने जाना है रंग
वरना कोई लाल भी कभी लाल होता है भला
तुमने जाने हैं शब्द
इसलिए तुम्हें फूलों की नस्ल जाननी है
और उच्चारित करना है 'अवसाद'

तुम्हारे कोंस्पेट, तुम्हारा विज्ञान बड़ा रुढ़िवादी है

जैसे फेसबुक में कोई लाइक का बटन दबाये
और तुम आनन्दित होते हो
वैसा ही है तुम्हारा प्रेम
और ये बुरा नहीं

फेसबुक भी उतना ही वर्च्युअल है जितना जिंदगी

पानी का गीला होना ज़ादू नहीं अगर
तो हवा में लटके रहना भी असम्भव नहीं।

सबसे बड़ी अभिव्यक्ति आंसूओं को नहीं माना जाना चाहिए

खुद को ताउम्र सहन करना 
बने रहना ख़ुद के साथ हमेशा 
कभी खुद को भूला न पाए
कभी खुद की याद न आये 
अपने को खोजना दरअसल घुप्प अँधेरे में सुई खोजना नहीं 
वो है अँधेरा खोजना 

अपना होना बाकी सब की अनुपस्थिति मात्र है 
इससे अधिक कुछ नहीं
इतना सा भी नहीं 

कान बंद करके सुना जा सकता है जिसे
आँख बंद करके देखा जा सकता है उसे
महसूस किया जा सकता है जिसका स्पर्श
सारी सम्वेदनाओं को नकार के

असत्य है ये कथन कि मैं उदास हूँ
मैं खुद को खुद ही उदास करता हूँ,
मेरे पास मेरा कोई विकल्प नहीं
मृत्य भी नहीं
आत्महत्या करना भी खुद की उम्मीद करना ही है
अपने को स्वीकारना.

कुछ लिखने या कहने से अधिक बड़ी अभिव्यक्ति
रोना और चार सौ कविताएँ पढना
अन्यथा कुछ भी तो न पढ़ता
और अगर पढ़ता तो
कोई कविता अधूरी पढ़े बिना नहीं छोड़ता

और जब मैं अपने को जानने के बावज़ूद
प्रेम कर सकता हूँ अपने से
तो कोई कारण नहीं कि फिर मैं किसी और से प्रेम न करूं.
बाकी सब तो फिर भी अपेक्षाकृत कम 'मैं' हैं.

वास्तिवकता करो

कल्पना करो कि तुम नौकरी करते हो
कल्पना करो कि तुम खाते पीते हो
कल्पना करो शादी करते हो
कल्पना करो तुम्हारे बच्चे हैं
मान लो कि तुम्हारा एक परिवार है
मान लो कि हर महीने मकान की ई. एम. आई. भरते हो
और हर वर्ष आई. टी. रिटर्न
समझो ऐसा कि तुम अपनी प्रेमिका को चूमते हो
और बाहों में भरते हो
मई के महीने में तुम पसीने पसीने हो जाते हो
और सोचो कि दिसम्बर में ठिठुरन होती है
कैसा हो कि अमेरिका जैसा कोई राष्ट्र
रशिया से पहले चाँद में पहुंच जाए
और सोचो कोई ऐसा यंत्र जिससे मीलों दूर रहकर भी सुन सको एक दूसरे की आवाज़
किसी सिद्धार्थ का बुद्ध होना सोचो
और सोचो कि एक दिन हम मर जाएंगे
कभी सोचो कि तुम बहुत प्रेम करते हो
और अलगे पल अपने अवसाद सोचो
सोचो कि तुम 'हो'
यकीन करोगे तो सब सच लगने लगेगा तुम्हें एक दिन
कल्पना करो जो नहीं है
कल्पना करो बस वही तो है
बस इसलिए ही तो है।

लव एट दी टाइम ऑव... ...बीइंग इन लव !

मुझे किसी 'कोई नहीं' से प्रेम हुआ चाहता है
किन्तु वो 'कोई नहीं' 'कोई भी नहीं' नहीं है
वो कोई है 
किन्तु वो 'कोई न कोई तो है' नहीं है
वो 'कोई जिसे मैं नहीं जानता' नहीं है
किन्तु 'पता नहीं कौन' तो कतई नहीं है

मुझे बर्फ पड़ने का आनन्द बिना बर्फ पड़े आ रहा है
अब वास्तविकता में बर्फ पड़ जाने के की दशा में अपना आनंद बर्फ के ऊपर आरोपित करना पड़ रहा है
बर्फ का वास्तविकता में पड़ जाना मेरे वास्तविक एहसासों को झुठला दे रहा है
किसी न होने से प्रेम करने के पश्चात
'किसी से भी' या 'किसी से' प्रेम करना अवास्तविक लगता है मुझे
मैंने 'किसी की कल्पना' से नहीं किया प्रेम
अतः कोई हो जाए सामने तो उसकी कल्पना करनी पड़ेगी
किसी स्थूल पर आरोपित हो जाए यदि मेरा प्रेम
तो मेरा प्रेम छद्म हो जाएगा
वाह्य 'न' हो जाना यदि 'हो जाना' हो जाएगा
आंतरिक 'होना' समाप्त हो जाएगा

हीलियम

केवल एक विकल्प होना
कोई विकल्प न होना होता है
जब कहते हैं हम कि हमारे पास एक ही विकल्प था
तब दरअसल हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं होता
जीवन के इलावा हमारे पास कोई विकल्प है क्या
जीवन का हमारे इलावा क्या विकल्प?
आदर्श स्थिति किसी विकलांग द्वारा हालिया हादसे में गवाए हाथ हैं
जिनका आभास जब तब उसे होता रहता है।
जीवन विकलांग नहीं होना चाहता
जीवन आदर्श स्थिति चाहता है
और ये न भी हो तो भी
केवल प्रेम के एहसास के आभास को जी लेना चाहता है

प्रेम का भी क्या विकल्प

प्रथम प्रेम करने के लिए दूसरी बार प्रेम करना आवश्यक है

चीजें कितनी आसान होती हैं
समझ जाने के बाद

कर चुकने के बाद 
दोबारा करना
पहली बार करना नहीं होता

इक्यासिवीं बार कोल्ड कॉफ़ी पीना
बारहवीं बार पगडंडी पर चलना
सत्रहवीं बार रोना

जीना पता नहीं कौनसीवीं बार

दिन में दूसरी बार नहाना
पहली बार नहाने के लिए

आखिरी बार आत्महत्या करना

हर बार प्रथम बार प्रेम करने को दोहराना

21 Grams

एक मरा हुआ हिरण चाहता है कि वो
धरा के सभी भेड़ियों की उदर पूर्ती कर सके
हार चुका सैनिक 
आत्मसमर्पण में भी आत्मसम्मान ढूंढ लेता है
कहते हैं कि हर रोटी का भार इक्कीस ग्राम होता है
(आत्मा के भार के बराबर)

हिरण की आत्मा नहीं मरती
सैनिक का आत्मसम्मान नहीं मरता
रोटी का भार नहीं मरता

इन तीन चीज़ों के इलावा भी कई चीज़ें हैं जो नहीं मरती
दरअसल चीज़ों के इलावा कोई चीज़ नहीं मरती
जिन क्षणों में मैं मृत्यु को प्राप्त होऊं
उन क्षणों में मैं चाहूँगा कि तुम किसी दूसरे कमरे में रहने लगो
कहते हैं कि मृत्यु शैय्या में पड़े व्यक्ति के ऊपर
गिरने वाले आंसू कभी नहीं मरते

वे किसी आत्माहीन हिरण का शरीर बनते हैं
या फ़िर किसी सैनिक का आत्मसमर्पण
या एक रोटी के बराबर भार का भार