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आम होने के प्रति...

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मैं एक आम आदमी हूँ,
बहुत ज़्यादा आम.

मन जब भी होता है,
ए-४ शीट में...
दुनियाँ के सभी दर्द उकेरने का,
तुम्हारे और मेरे आंसू...
कागज़ गुलाबी बना देते हैं.
मैं एक आम कवि हूँ.

उस लगभग ढहती हुई दिवार से सटाकर...
जब अंगीकार करता हूँ तुम्हें ,
तुम्हारी पीठ से छुप जाती हैं...
हँसिया और हथौड़ा,
मैं एक आम कॉमरेड हूँ.


जब तुम्हें देखता हूँ...
निर्वाणा की शर्ट पहने,
फ्लूरोसेंट ओउम भी दिखता है...
तुम्हारे उभारों में.
मैं एक आम योगी हूँ.

सुहागरात याद आती है...
जब कभी,
क्वांटम थ्योरी की...
एक में से केवल एक ही बिल्ली मरती है,
मैं एक आम वैज्ञानिक हूँ.

जब किसी वैश्या, भिखारी...
या सडती हुई लाश का...
करुण-क्रंदन सुनता हूँ,
तो छुपा लेता हूँ अपने आप को...
तुम्हारे ज़ानों के बीच.
मैं एक आम समाजवादी हूँ.

पीड़ा और आनंद...
दोनों,
तुम्हें पाकर,
एक साथ मिलते हैं यहाँ !
ठीक इसी जगह !!
ब्रेक इवेन पॉइंट !!!
मेरा अर्थशाश्त्र आम है.





युद्ध में,
किसी कलिंग सा हुआ जाता हूँ मैं,
मैं एक आम योद्धा हूँ.
/प्रेम में,
किंचित-वासनामय.
मैं एक आम प्रेमी हूँ.
...और इस तरह,
युद्ध और प्रेम में झूलता,
मेरा इतिहास आम है.




देखो...
कितना आम सा दर्शन है मेरा.
है ना?

...अरे, सच !!
मैं तो,
एक आम आदमी हूँ,
बहुत ज़्यादा आम.

और ये...
'बहुत ज़्यादा' आम होना
'कुछ हद तक' ख़ास बनत है मुझे,
कम से कम...
...तुम्हारी नज़रों में.

संदूक

चित्र

आज...
फ़िर,
....
....
उस,
कोने में पड़े,
धूल लगे 'संदूक' को,
हाथों से झाड़ा...

धूल...
...आंखों में चुभ गई .

संदूक का,
कोई 'नाम' नहीं होता.

पर,
इस संदूक में,
एक खुरचा सा 'नाम' था .
....
....
सफ़ेद पेंट से लिखा .

तुम्हारा था?
या मेरा?
पढ़ा नही जाता है अब .

खोल के देखा उसे,
ऊपर से ही,
बेतरतीब पड़ी थी...
'ज़िन्दगी'।

मुझे याद है,
माँ ने,
जन्म दिन में,
'उपहार' में दी थी।

पहली बार देखी थी,
तो लगता था,
कितनी छोटी है !

पर,
आज भी ,
जब पहन के देखता हूँ,
बड़ी ही लगती है,

शायद...
...कभी फिट आ जाए।

नीचे उसके,
तह करके,
सलीके से,
रखा हुआ है...
...'बचपन' ।

उसकी जेबों में देखा,
अब भी,
तितलियों के पंख,
कागज़ के रंग,
कुछ कंचे ,
उलझा हुआ मंझा,
और...
....
....
और न जाने क्या क्या ?

कपड़े,
छोटे होते थे बचपन में,
....
....
....जेब बड़ी.

कितने ज़तन से,
...मेरे पिताजी ने,
मुझे,
ये
'इमानदारी',
सी के दी थी ।
बिल्कुल मेरे नाप की ।
बड़े लंबे समय तक पहनी।
और,
कई बार,
लगाये इसमे पायबंद ,
कभी 'मुफलिसी' के,
और कभी,
'बेचारगी' के .

पर,
इसकी सिलाई,
....
....
उधड गई थी, एक दिन.
...जब,
'भूख' का खूंटा लगा इसमे.

उसको हटाया,
तो नीचे...
पड़ी हुई थी,
'जवानी'.

उसका रंग उड़ गया था,
समय के साथ साथ।
'गुलाबी' हुआ करती थी ये .

अब पता नहीं ,
कौनसा,
नया रंग हो गया है?

बगल में ही,
पड़ी हुई थी,
'आवारगी'.

....उसमें से,
अब भी,
'शराब' की बू आती है।

४-५,
सफ़ेद,
गोल,
'खुशियों' की 'गोलियाँ',
डाली तो थीं,
संदूक में.

पर वो खुशियाँ...
....
....
.... उड़ गई शायद।

याद है...
जब तुम्हारे साथ,
मेले में गया था ?

एक जोड़ी,
'वफाएं' खरीद ली थी।
तुम्हारे ऊपर तो पता नहीं,
पर,
मुझपे...
.....
.....
ये अच्छी नही लगती।

और फ़िर...
इनका 'फैशन' भी,
...नहीं रहा अब .

...और ये,
शायद...
'मुस्कान' है।

तुम,
कहती थी न...
जब मैं इसे पहनता हूँ,
तो अच्छा लगता हूँ।
इसमें भी,
दाग लग गए थे,
दूसरे कपडों के।
हाँ...
....
....
इसको.....
'जमाने'
और
'जिम्मेदारियों'
के बीच रख दिया था ना ।

तब से पेहेनना छोड़ दी।

अरे...
ये रहा 'तुम्हारा प्यार'।
'वेल्लेनटें डे ' में,
दिया था तुमने।

दो ही महीने चला था,
हर धुलाई में,
सिकुड़ जाता था।
भाभी ने बताया भी था,
"इसके लिए,
खारा पानी ख़राब होता है."

पर आखें,
आँखें  ये न जानती थी।

चलो,
बंद कर देता हूँ,
सोच के...
जैसे ही संदूक रखा,
देखा,
'यादें' तो बाहर ही छूट गई,
बिल्कुल साफ़,
नाप भी बिल्कुल सही.

लगता था,
जैसे,
आज के लिए ही खरीदी थी,
उस 'वक्त' के बजाज से
कुछ लम्हों की कौडियाँ देकर .

चलो,
आज...
फ़िर,
....
....
इसे ही,
पहन लेता हूँ .