गुरुवार, 27 अगस्त 2015

स्मार्ट फोन की तितली में तितलियों से ज़्यादा रंग हैं

चूक गया हूँ
बहुत बड़े मार्जिन से
मैंने कोई ऐसी स्त्री तो नहीं देखी
जिसे दिल तोड़ने की मशीन कहा जाता है
मगर मैं जानता हूँ एक ऐसे शख्स को
जिसे आप उम्मीद तोड़ने की मशीन कह सकते हैं
जो घमंडी है, सेल्फ - ओब्सेस्ड है
हारा हुआ है (अनंत बार)
कुंठित है अस्तु
कितना सब कुछ है सोच में,
मग़र सब रिपीटेटिव
और अगर कुछ नया है भी
तो एक बिज़नेस प्लान
"अतीत में लिखे गए को एक रुपया प्रति शब्द कैसे बेचा जाय?"
अगर आज मैं स्त्री की बात करूँ तो वो रुग्ण होगी
अगर आज मैं चिड़ियाँ की बात करूँ तो उसके पंख मटमैले होंगे
अगर आज मैं गाँव की बात करूँ तो उस तक सड़क नहीं पहुंची होगी
अगर आज मैं क्रान्ति की बात करूँ तो वो जुटाए गए तथ्य और कोरी साख्यिकी होगी.
अगर आज मैं रात की बात करूँ तो वो चोर उचक्के, रेव पार्टीज़, हनी सिंह और माइग्रेन की बात होगी
शाम का मतलब मेरे लिए नेशनल हाइवे एट का जाम होगा
सुबह एक हैंगओवर होगी
दिन होगा हज़ारों स्ट्रगल और टारगेट एडहियरऐंस से लबरेज़
सरोकारों में ऍन. जी. ओ., चेरिटेबल म्यूज़िक नाईट्स, पेज थ्री और डोनेशन्स होंगे
इनमें से कुछ भी कविता नहीं
स्मार्ट फोन की तितली में तितलियों से ज़्यादा रंग हैं
ऍन. एस. डी. के नाटकों में संवेदनाओं से ज़्यादा आंसू हैं
फ़ेसबुक के स्टेटसों में सरोकारों से ज़्यादा विचार हैं
बारिशों में भीगने से ज़्यादा जतन हैं
पहाड़ों में घूमने से ज़्यादा डर
जब आपको अपनी नींद सबसे प्यारी लगे
समझ जाइए, वास्तविकता कुरूप हो चुकी है
जब आपको अतीत में रहना रुचिकर लगे
जान जाइए अपने वर्तमान की अप्रासंगिकता
जब आपको किसी की छोटी से छोटी सफलता से कोफ़्त होती हो
निश्चित है कि आप बुरी तरह से असफल हो चुके हैं
ख़ुशी की परिभाषा अब इतनी है बस कि
शरीर कही भी नहीं दुःख रहा
ये भी तो कई दिनों में एक बार नसीब होती है
मुझे मृत्यु से भी ज़्यादा डर परहेज़ से लगता है
चश्मा लग जाएगा कल
परसों हियरिंग एड्स
उसके अलगे दिन शायद हार्ट ट्रांसप्लांट हो
चाहे मैं अपनी मर्ज़ी से ताउम्र न खाऊँ भिन्डी
लेकिन वो नरक होगा मेरे लिए
अगर मेरी प्लेट से हटा दी जाय वो आज के बाद से
ताउम्र के लिए
न जाने कौनसी सिगरेट अंतिम हो
न जाने कौनसी सांस
आई. सी. यू. के बाहर ली गयी
अंतिम सांस हो
क्या पता किसी दिन उठूँ और
और
इस वजह से सोये रहना चाहता हूँ
इस वजह से अत्तीत में खोया रहना चाहता हूँ

शनिवार, 5 जुलाई 2014

Method Acting

एक नाटक में अभिनय करना
मात्र अभिनय करना है
अपने अभिनय से प्रेम करना
प्रेम का अभिनय करना
रोने का पूर्वाभ्यास 
पूर्वाभ्यास का रोना
अवसाद का दृश्य
दृश्य का अवसाद
मृत्यु का पटाक्षेप

एक वक्त भी एहसास न होने देना कि यह अभिनय है
जीवंत अभिनय है

इश्वर की आराधना करें
प्रकट हो जाए वो
एक वरदान का अभिनय
अभिनय का वरदान
पूर्णत्व की आकाँक्षा



I Remember My Future

मैं, मैं ही हूँ
बिना किसी के जीवन को प्रभावित किये
'शुद्ध मैं'
जब मैं कहता हूँ कि मैं एक हफ़्ते बाद आत्महत्या कर लूँगा
तो मैं नहीं चाहता कि मेरा इंतज़ार किया जाय एक हफ्ते तक
क्यूंकि मैं आज ही आत्महत्या कर चुका एक हफ़्ते बाद
जब मैं कहता हूँ कुछ भी
मैं जी रहा होता हूँ वो सब कुछ
जब मैं होता हूँ कोई और
तो मैं वो ही होता हूँ
मैं मैं ही होता हूँ
अन्यथा नहीं

सत्य पता लगने पर ही असत्य ज्ञात होगा तुम्हें
अतः स्वप्न देखे जाने वाले क्षणों में वास्तविकता हैं
निजी स्वप्न किसी भी दशा में देखे जाने चाहिए

जिस तरह भविष्य याद है अब भी मुझे
उस तरह सन 2003 में समझ आएगी तुम्हें ये बात

बहने दो इस ऑरा में अपनी सारी नफरतें...

प्रेम की एक्सट्रीम क्या है
डूबकर नफ़रत करना

नफ़रत न की तो प्रेम झूठ था तुम्हारा
प्रेम का डायल्यूटेड वर्ज़न था वो सिम सिम कर जलना

अरे
प्रेम के एहसास इतने प्योर थे जब
तो नफरतों को क्या हुआ तुम्हारी?

"जहाँ ऊंचाई होगी तो निचाई भी होगी" कहकर
क्लिशे मत करो ये बात
ऊंचाई के वजह से ही तो निचाई है
गहराई है
जितना ऊँचा होगा तुम्हारा प्रेम
उतनी ही गहरी होनी चाहिए तुम्हारी नफरतें

मैं उन्हें पाखंडी समझता हूँ जो कहते हैं
उनके ह्रदय में प्रेम ही प्रेम है

खून करने की 'सोचो' प्रेम करने की नहीं।
प्रेम स्वतः 'होगा' इस तरह
जला देने की सोचो ये दुनियां
यूँ बस जाए शायद वो

जानो नफ़रत को
वो जानते ही समाप्त हो जायेगी
वो जानकर ही समाप्त होगी
जिस युग का इतिहास युद्ध होगा
प्रेम कविताएँ होंगी उस युग का साहित्य
वही धर्म कहेगा प्रेम की बात
जो धर्म नफ़रत से भरा धर्म होगा

तुमको देखकर आश्चर्य होता है
जब तुम कहते हो
सर्वे भवन्तुः सुखिना
अस्तु तुम दुनियाँ के सबसे दुखी लोग हो

यकीन करो जान जाओगे एक दिन प्रेम
असली प्रेम
ख़ालिस प्रेम
मगर पहले
खुलकर बोलो नफ़रतों के बारे में

मैं फ़िर भूल जाता हूँ छतरी ले जाना

भूला दिए गये की सफलता इस बात पर निर्भर है कि
क्या भूले ये कभी याद न आये
फ़िर भी मुझे याद है कि मैं भूल चूका हूँ
रात के वक्त की रजनीगन्धा की खुश्बू
कोई चीज़ अचानक याद आना
अचानक से कोई दूसरी चीज़ भूल जाना होता है
जब उन्हें याद हो आई 'बरसने' की
ठीक तब बादल भूल गये थे 'न बरसना'
और यूँ भीग जाने के दौरान 
मुझे याद आया कि मैं फ़िर भूल जाता हूँ छतरी ले जाना।

मुझे हमेशा से पता था कि
इसे भूला जा सकता है
बीवी की चिक चिक और बच्चों की खट पट के बीच
इसी वजह से
मैं कभी नहीं भूलता था इसे
आज बीवी की चिक चिक नहीं थी चूँकि
और नहीं थी बच्चों की खट पट भी
इसलिए देखो तो ज़रा
मुझे भी याद न रहा कि मैं भूल सकता हूँ
और यूँ
मैं फ़िर भूल जाता हूँ छतरी ले जाना।

कितनी ही तो चीजें हैं
कितनी ही बातें
सोचने पर उन सबका भूलना याद आए शायद
जैसे मैं भूल चूका हूँ
पॉपिंस में से केवल नीली गोली चुनना
एक निश्चित रास्ते चलते जाने के कारण
भूल चूका हूँ रास्ता भूल जाना
दिन और रात की असीमित तीव्रता के कारण
शाम का होना भूल चुकी है शाम
भूल चुका हूँ बारिश में भीगना
क्यूंकि कभी नहीं भूलता छतरी ले जाना।

सड़क पार करना दो तरह से भूला जा सकता है
एक, सड़क पार ही न करना
दूसरा, सड़क पार करके भूल जाना कि हम दूसरी ओर हैं
मैं इस दूसरी तरह से हर चीज़ भूल चूका हूँ
जैसे प्रेम, जीना और सिगरेट पीना

कहते हैं कि ध्यान में रहते हुए
नहीं पी जा सकती सिगरेट
जैसे होश में रहते हुए नहीं किया जाता प्रेम
नहीं जिया जा सकता ये जानते हुए कि जी रहे हैं।

जब मुझे याद रहता था कि छतरी लेकर जाना है
मेरे अन्तःमन में छतरी ले जाने की कोई पूर्व स्मृति रहती थी
कुछ याद रखना हमेशा पुनरावृति है
किन्तु कुछ भूल जाना हमेशा पहली बार ही होता है
बेशक मैं कहता हूँ कि
'फ़िर' भूल जाता हूँ छतरी ले जाना
लेकिन पिछली बार भूला था
ये याद नहीं
यूँ मैं हर बार पहली बार भूलता हूँ छतरी भूलना

नीली छतरी ले जाना
नहीं होता पीली छतरी ले जाना
मगर छतरी भूलना
मात्र भूलना होता है
कुछ याद रखने में
बना रहता है कुछ भूल जाना
किन्तु कुछ भूलना
शुद्ध रूप से भूलना होता है

भूलते जाना सब कुछ
और सब कुछ भूल जाना
और अंततः ये भी भूल जाना कि भूल गये
मोक्ष है
बस ये भी न याद रहे किन्तु कि ये मोक्ष है

कई बार मोक्ष की प्राप्ति के लिए
जान बूझ कर
फ़िर फ़िर भूलता हूँ छतरी ले जाना
किन्तु जान बूझ कर कोई चीज़ भूल नहीं सकते
इसलिए छतरी भूलने से मुझे आज तक मोक्ष नहीं मिला

भीगने न भीगने के बीच
प्रार्थना भर का अंतर होता है
इबादत में उठे हाथ
खुली हुई छतरी सरीखे अर्ध चन्द्राकार होते हैं
प्रार्थनाएं बरसात को रोकती नहीं
वे कभी भी इतनी कमज़ोर नहीं कि
विस्थापित कर दें द्रोणागिरि
इसलिए वे अत्यंत निजी रूप से
आपको भर बचाए रखती हैं
हर कोई भूलता जा रहा है छतरियां ले जाना
प्रार्थनाएं टंगी रहती हैं
बंद किसी खूँटी में
मन्दिर बंद हैं मन्दिरों में

मैं फ़िर भूल जाता हूँ छतरी ले जाना
लेकिन मैं नहीं भूल सकता छतरी ले जाना
मैं भूल जाता हूँ
पर...
...मैं भूल नहीं सकता।

कैफ़े कैपचीनो

तेरा लम्स ऐ तवील कि जैसे कैफ़े कैपचीनो
ऊपरी तौर पर
ज़ाहिर है जो उसका
वो कितना फैनिल
कितना मखमली
यूँ कि होठों से लगे पहली बार वो चॉकलेटी स्वाद कभी
तो यकीं ही न हो
कुछ छुआ भी था
क्या कुछ हुआ भी था?
जुबां को अपने ही होठों से फ़िराकर 
उस छुअन की तसल्ली करता रहा था दफ़'तन
कुछ नहीं और कुछ-कुछ के बीच का कुछ
एक जाज़िब सा तसव्वुफ़

तेरा लम्स ऐ तवील
और उसकी पिन्हाँ गर्माहट
जुबां जला लिया करता था
उस न'ईम त'अज्जुब से कितनी ही दफ़े

जब भी होती थी
पहली बार में कहाँ नुमायाँ होती थी वो

तेरा लम्स ऐ तवील
जिसका ज़ायका उसके मीठेपन से न था कभी
उम्मीदों की कड़वी तासीर हमेशा रही थी
बहुत देर तक
आज तक चिपकी हुई है रूह से जो

तेरा लम्स ऐ तवील
बेशक माज़ी की नीम बेहोशी का चस्मक
मगर जिसने ख्वाबों के हवाले किया हर बार

बस इख़्तियार नहीं रहता
इसलिए, उसे जज़्ब कर लिया
आख़िरी घूँट तक
वरना यूँ तो न था कि तिश्नगी कमतर हुई हो उससे

तेरा लम्स ऐ तवील
कि जैसे कैफ़े कैपचीनो



लम्स-ऐ-तवील: दीर्घ स्पर्श, तिश्नगी: प्यास, तसव्वुफ़: mystical, त'अज्जुब: आश्चर्य, न'ईम: आनंद, चस्मक: Disillusion, जाज़िब-मनमोहक

फेसबुक भी उतना ही वर्च्युअल है जितना जिंदगी

जब से तुम जानते हो तभी से उस चीज़ का अस्तित्व होता है

दर्पण में बनने वाला प्रतिबिम्ब
वहाँ हमेशा ही होता है
कभी कनखियों से देखना
धीरे धीरे दबे पाँव जाकर
उसकी चोरी पकड़ लोगे तुम
तुम पहले से ही मौजूद थे वहाँ

आंसू की पहली बूंद इसलिए मीठी होती है
क्यूंकि उसका स्वाद होठों तक नहीं पहुंच पाता
कभी बस एक बूँद रोकर देखना

तुम जब घर में ताला लगा के घुमने जाते हो
गायब हो जाता है सारा सामान भी
कभी चुपके से बिन बताये आना
कुछ नहीं मिलेगा वहाँ
घर भी नहीं

कभी हुआ है ऐसा कि अनजाने में
तुमने दूसरी ही चाबी से खोल डाला ताला
कितनी ही बार तो हुआ है कि
तुम सोये घर में उठे ट्रेन की किसी बर्थ में
तुमने पूछा फिर तुम कैसे आये यहाँ
और किसी बहाने ने बनाई रखी कंटीन्यूटी

लॉकर में रखा सामान इतनी सिक्युरिटी के बावज़ूद
वहाँ तुम्हारे देखने के बाद ही उपस्थित होता है

तुम जानते हो कि तुम पचासवीं मंजिल से कूद नहीं सकते
इसलिए वहाँ से केवल मरने के वास्ते कूदते हो
वरना लियोनार्डो को कभी चोट न लगती
वरना कीड़े खाकर उड़ने लगती
न्यूटन की बहन

तुमने जाना है समय को
जैसा उन्होंने तुम्हें बताया
वरना तुम्हारे पास जीने के अनंत क्षण होते
तुमने जाना है रंग
वरना कोई लाल भी कभी लाल होता है भला
तुमने जाने हैं शब्द
इसलिए तुम्हें फूलों की नस्ल जाननी है
और उच्चारित करना है 'अवसाद'

तुम्हारे कोंस्पेट, तुम्हारा विज्ञान बड़ा रुढ़िवादी है

जैसे फेसबुक में कोई लाइक का बटन दबाये
और तुम आनन्दित होते हो
वैसा ही है तुम्हारा प्रेम
और ये बुरा नहीं

फेसबुक भी उतना ही वर्च्युअल है जितना जिंदगी

पानी का गीला होना ज़ादू नहीं अगर
तो हवा में लटके रहना भी असम्भव नहीं।

सबसे बड़ी अभिव्यक्ति आंसूओं को नहीं माना जाना चाहिए

खुद को ताउम्र सहन करना 
बने रहना ख़ुद के साथ हमेशा 
कभी खुद को भूला न पाए
कभी खुद की याद न आये 
अपने को खोजना दरअसल घुप्प अँधेरे में सुई खोजना नहीं 
वो है अँधेरा खोजना 

अपना होना बाकी सब की अनुपस्थिति मात्र है 
इससे अधिक कुछ नहीं
इतना सा भी नहीं 

कान बंद करके सुना जा सकता है जिसे
आँख बंद करके देखा जा सकता है उसे
महसूस किया जा सकता है जिसका स्पर्श
सारी सम्वेदनाओं को नकार के

असत्य है ये कथन कि मैं उदास हूँ
मैं खुद को खुद ही उदास करता हूँ,
मेरे पास मेरा कोई विकल्प नहीं
मृत्य भी नहीं
आत्महत्या करना भी खुद की उम्मीद करना ही है
अपने को स्वीकारना.

कुछ लिखने या कहने से अधिक बड़ी अभिव्यक्ति
रोना और चार सौ कविताएँ पढना
अन्यथा कुछ भी तो न पढ़ता
और अगर पढ़ता तो
कोई कविता अधूरी पढ़े बिना नहीं छोड़ता

और जब मैं अपने को जानने के बावज़ूद
प्रेम कर सकता हूँ अपने से
तो कोई कारण नहीं कि फिर मैं किसी और से प्रेम न करूं.
बाकी सब तो फिर भी अपेक्षाकृत कम 'मैं' हैं.

वास्तिवकता करो

कल्पना करो कि तुम नौकरी करते हो
कल्पना करो कि तुम खाते पीते हो
कल्पना करो शादी करते हो
कल्पना करो तुम्हारे बच्चे हैं
मान लो कि तुम्हारा एक परिवार है
मान लो कि हर महीने मकान की ई. एम. आई. भरते हो
और हर वर्ष आई. टी. रिटर्न
समझो ऐसा कि तुम अपनी प्रेमिका को चूमते हो
और बाहों में भरते हो
मई के महीने में तुम पसीने पसीने हो जाते हो
और सोचो कि दिसम्बर में ठिठुरन होती है
कैसा हो कि अमेरिका जैसा कोई राष्ट्र
रशिया से पहले चाँद में पहुंच जाए
और सोचो कोई ऐसा यंत्र जिससे मीलों दूर रहकर भी सुन सको एक दूसरे की आवाज़
किसी सिद्धार्थ का बुद्ध होना सोचो
और सोचो कि एक दिन हम मर जाएंगे
कभी सोचो कि तुम बहुत प्रेम करते हो
और अलगे पल अपने अवसाद सोचो
सोचो कि तुम 'हो'
यकीन करोगे तो सब सच लगने लगेगा तुम्हें एक दिन
कल्पना करो जो नहीं है
कल्पना करो बस वही तो है
बस इसलिए ही तो है।

लव एट दी टाइम ऑव... ...बीइंग इन लव !

मुझे किसी 'कोई नहीं' से प्रेम हुआ चाहता है
किन्तु वो 'कोई नहीं' 'कोई भी नहीं' नहीं है
वो कोई है 
किन्तु वो 'कोई न कोई तो है' नहीं है
वो 'कोई जिसे मैं नहीं जानता' नहीं है
किन्तु 'पता नहीं कौन' तो कतई नहीं है

मुझे बर्फ पड़ने का आनन्द बिना बर्फ पड़े आ रहा है
अब वास्तविकता में बर्फ पड़ जाने के की दशा में अपना आनंद बर्फ के ऊपर आरोपित करना पड़ रहा है
बर्फ का वास्तविकता में पड़ जाना मेरे वास्तविक एहसासों को झुठला दे रहा है
किसी न होने से प्रेम करने के पश्चात
'किसी से भी' या 'किसी से' प्रेम करना अवास्तविक लगता है मुझे
मैंने 'किसी की कल्पना' से नहीं किया प्रेम
अतः कोई हो जाए सामने तो उसकी कल्पना करनी पड़ेगी
किसी स्थूल पर आरोपित हो जाए यदि मेरा प्रेम
तो मेरा प्रेम छद्म हो जाएगा
वाह्य 'न' हो जाना यदि 'हो जाना' हो जाएगा
आंतरिक 'होना' समाप्त हो जाएगा

हीलियम

केवल एक विकल्प होना
कोई विकल्प न होना होता है
जब कहते हैं हम कि हमारे पास एक ही विकल्प था
तब दरअसल हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं होता
जीवन के इलावा हमारे पास कोई विकल्प है क्या
जीवन का हमारे इलावा क्या विकल्प?
आदर्श स्थिति किसी विकलांग द्वारा हालिया हादसे में गवाए हाथ हैं
जिनका आभास जब तब उसे होता रहता है।
जीवन विकलांग नहीं होना चाहता
जीवन आदर्श स्थिति चाहता है
और ये न भी हो तो भी
केवल प्रेम के एहसास के आभास को जी लेना चाहता है

प्रेम का भी क्या विकल्प

प्रथम प्रेम करने के लिए दूसरी बार प्रेम करना आवश्यक है

चीजें कितनी आसान होती हैं
समझ जाने के बाद

कर चुकने के बाद 
दोबारा करना
पहली बार करना नहीं होता

इक्यासिवीं बार कोल्ड कॉफ़ी पीना
बारहवीं बार पगडंडी पर चलना
सत्रहवीं बार रोना

जीना पता नहीं कौनसीवीं बार

दिन में दूसरी बार नहाना
पहली बार नहाने के लिए

आखिरी बार आत्महत्या करना

हर बार प्रथम बार प्रेम करने को दोहराना

21 Grams

एक मरा हुआ हिरण चाहता है कि वो
धरा के सभी भेड़ियों की उदर पूर्ती कर सके
हार चुका सैनिक 
आत्मसमर्पण में भी आत्मसम्मान ढूंढ लेता है
कहते हैं कि हर रोटी का भार इक्कीस ग्राम होता है
(आत्मा के भार के बराबर)

हिरण की आत्मा नहीं मरती
सैनिक का आत्मसम्मान नहीं मरता
रोटी का भार नहीं मरता

इन तीन चीज़ों के इलावा भी कई चीज़ें हैं जो नहीं मरती
दरअसल चीज़ों के इलावा कोई चीज़ नहीं मरती
जिन क्षणों में मैं मृत्यु को प्राप्त होऊं
उन क्षणों में मैं चाहूँगा कि तुम किसी दूसरे कमरे में रहने लगो
कहते हैं कि मृत्यु शैय्या में पड़े व्यक्ति के ऊपर
गिरने वाले आंसू कभी नहीं मरते

वे किसी आत्माहीन हिरण का शरीर बनते हैं
या फ़िर किसी सैनिक का आत्मसमर्पण
या एक रोटी के बराबर भार का भार

शनिवार, 16 नवंबर 2013

कितना सुख था कि हर बार घर लौटकर आने के लिए मैं बार-बार घर से बाहर निकलूँगा

आत्महत्या सबसे बड़ा पलायन नहीं
उससे बड़ा पलायन है उसे टालते चले जाना
पलायन नाउम्मीदी की जाया नहीं
असंतुष्टि से जन्मी अदूरदर्शी क्रांति है
(कौनसी क्रांति दूरदर्शी रही है वैसे)
हारे हुए तो सब हैं
अपनी हार को खेल भावना के चलते
सहर्ष स्वीकार करना है पलायन
समर्पण भक्ति मार्ग का योगभ्रष्ट है यदि
तो ज्ञान मार्ग का भटका पलायन
पलायन में पूर्णता आने पर यकीन कीजिये
जब कुछ न होगा नकारने को
आप पलायन से भी पलायन कर जाओगे
सारे संरक्षित फोसिल्स के बीच
डो डो प्रजाति सा
पलायन नैसर्गिक है

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Title Courtesy : विनोद कुमार शुक्ल 

क्लॉकवर्क-ऑरेंज को देखते हुए



जो सफ़ल थे
केवल उनकी असफलताएँ दर्ज़ हैं इतिहास में
जबकि नदी, मछली और पहाड़ों की 'होती हैं' 
पूर्व निर्धारित भौगोलिक सीमा रेखाएं
मानव ने इतिहास से 'निर्मित किया' है उन्हें
झूठ है कि इतिहास दोहराता है अपने आप को
वास्तविकता यह है कि 
हम सोच-समझ कर दोहराते हैं उसे
किसी कैलक्यूलेटेड रिस्क के चलते
सोचता हूँ,
कैसे याद रखती होंगी बिल्लियाँ अपना इतिहास
और चूहे क्यूँ भूल जाते हैं अक्सर उसे?
जीवित रहने के लिए इतिहास आवश्यक है
लेकिन अंततः यही मार डालता है हमें
इतिहास के बाहर सब टाईम प्रूफ है
अमर।
"मैं हूँ क्यूंकि मुझे पिछला पल याद है"
इतिहास पैराडॉक्सियल साजिश है किसी की
या खुद हमारी ही भूल शायद
हमारे इगो को जिलाए रखने की
हमको लगातार अपमानित करते हुए
इतिहास जब हमारी सोच को परतंत्र बनाता है
तो सर्वप्रथम वो हमारी सोच में फीड करता है
"तुम मुक्त हो"

एक अधूरी कविता भी होती है कविता

हमारा अस्तित्व दूसरे क्षण से प्रारम्भ हुआ दरअसल
हम कभी पहले क्षण में थे ही नहीं
हम हैं क्यूंकि हमें पिछला पल याद है
स्मृतियाँ ही अस्तित्व हैं
वो दूसरा क्षण ही प्रथम क्षण था 'होने' का
अपने पूर्व की स्मृति लिए हुए।
पहला पल जानना था
जानना द्वेत नहीं
द्वेत है ये जान लेना कि जान गये
यही था दूसरा क्षण

सब जान लेने के बाद भी बचा रहता है
जानने को जानना
और इसलिए
एक अधूरी कविता भी उतनी ही कविता होती है
पूर्णत्व की कोई परिभाषा नहीं होती
और जो भी परिभाषा है वो स्वयम पूर्ण नहीं है
अधूरेपन को परिभाषा की आवश्यकता ही नहीं

हम केवल देखते भर ही नहीं हैं सत्य
हम पहले निर्मित करते हैं उसे
और लगभग साथ-साथ उसे ग्रहण करते हैं
देखते हैं उसे।
हम अपनी रचनाशीलता से इतने मुग्ध हैं कि
न देखने वाले को देख पाए कभी
न बनाने वाले को।

कविता, इश्वर, मृत्यु और प्रेम
अकेले हैं अपने समस्त अधूरेपन के साथ
एक अधूरी कविता भी होती है कविता।

कौन मरा है भला आज तक

‘निर्वाणा’ बैकग्राउंड में चल रहा है.
कम एज़ यू आर...
और इस वक्त लिखने का बिलकुल भी मन नहीं.
इस क्षण की मनः स्थिती मेरे अस्तित्व का डी एन ए है...
सबसे क्षुष्मतम इकाई
तथापि, मेरे अस्तित्व की सारी आवश्यक जानकारी अपने आप में समेटे हुए
तो इस वक्त ‘भी’ लिखने का बिलकुल मन नहीं है.
शायद इसलिए ही लिख पा रहा हूँ.
फेसबुक में एक पर्सनल मैसेज पॉप अप होता है...
“आप सबसे ज्यादा किस चीज़ से डरते हो?”
“मृत्यु से”
“लेकिन आप तो कहते हो कौन मरा है भला आज तक?”
“इसलिए ही तो डरता हूँ”
दूसरों के प्रश्नों के उत्तर देते वक्त मुझे उन प्रश्नों के भी उत्तर मिलते रहे हैं
जो प्रश्न (उत्तर नहीं) मुझे आज तक ज्ञात ही न थे.
अकेलापन एक गर्भवती त्रासदी है
जो अतीत में सदा विक्षिप्तता ही जनती आई है
“तुम कितनी बकवास बात करते हो न आजकल?”
“हाँ ये अच्छा है.”
म्युज़िक प्लेयर्स में शफल का ऑप्शन
विचारों को विचार करके ही बनाया गया है.
गीत बदल चुका है...
...लव विल टियर अस अपार्ट अगेन.

पानी गीला क्यूँ होता है ?



मैं चाहता हूँ नदी को नदी की तरह लिखना

जिसमें पानी का गीला-पन हो
और बहाव हो
और उसके आस पास हो हरियाली
(बसंत में पीला-पन भी हो)
एक एक डिटेल हो 
और वो डिटेल ‘डायनेमिक’ हो 
लेकिन ये चित्रकारी न हो 
उसमें आवाजें हो कल कल 
(‘कल कल’ शब्दशः लिखना भी ‘कल कल’ नहीं है 
जैसे
फूल शब्दशः लिखना फूल नहीं है
दुःख को ‘दुःख’ लिखना नहीं होता, ‘दुःख’ को लिख लेना)
हम सफलता प्राप्त कर लेंगे एक दिन त्रिआयामी चल-चित्र बना सकने में,
और भर सकेंगे उसमें गंध और सम्वेदनाएँ
और कल्पनाओं को वास्तविकता के समतुल्य खड़ा कर देंगे
----जैसे आज तक करते आये हैं---- 

तुमसे प्रेम करना



तुमसे प्रेम करना एक निहायत ही ग़ैर जरूरी चीज़ रही हमेशा मेरे लिए.
जिया जा सकता है एक दूसरे के बिना भी
शायद उससे ज्यादा अच्छे से जितना साथ में रहकर. 
जरूरत नहीं हमें एक दूसरे की
ये और बात है कि हम 'चाहते' हैं एक दूसरे के साथ जीना.
तुम खाने, पीने, सांस लेने या सू सू करने जैसी कोई आवश्यकता नहीं हो मेरे लिए.
केवल इच्छा हो मेरी,
इच्छा,
जैसे वॉंग कोर वाई की इन दी मूड ऑव लव देखना. 
जैसे पैसोवा के किसी ज़ेन हेट्रोनिम को पढना.
जैसे हरी प्रसाद चौरसिया का हंसध्वनी सुनना.
जैसे पढना कसप को बेबी की खातिर
...बार बार.
इच्छा,
जैसे नहाने के बाद गीले बदन माइल्ड्स का एक कश,
जैसे स्वप्न देखना.

बेशक जीने के लिए 'जरूरी' चीजें चाहिए, मगर जीते हम ग़ैर जरूरी के वास्ते हैं.
सांस लेने हुए मर जाने की जरूरत के बीच में तुम विन्सेंट का ग़ैर जरूरी अंतिम सूरज हो मेरे लिए.
ग़लत कहते हैं लोग कि प्रेम जीने के लिए जरूरी होता है.
प्रेम के 'लिए' जीना जरूरी होता है.
प्रेम इच्छा है और जीना आवश्यकता.
आज़ादी और बंधन में वही अंतर है जो इच्छा और आवश्यकता में है.

दो अंतरालों के बीच




अगस्त का महिना हमेशा जुलाई के बाद आता है,
ये साइबेरियन पक्षियों को नहीं मालूम
मैं कोई निश्चित समय-अंतराल नहीं रखता दो सिगरेटों के बीच
खाना ठीक समय पर खाता हूँ
और सोता भी अपने निश्चित समय पर हूँ
अपने निश्चित समय पर
क्रमशः जब नींद आती है और जब भूख लगती है
इससे ज़्यादा ठीक समय का ज्ञान नहीं मुझे
जब चीटियों की मौत आती है, तब उनके पंख उगते हैं
और जब मेरी इच्छा होती है तब दिल्ली में बारिश होती है
कई बार मैंने अपनी घड़ी में तीस भी बजाए हैं
मेरे कैलेंडर के कई महीने चालीस दिन के भी गये हैं
मैं यहाँ पर लीप ईयर की बात नहीं करूँगा 
(मुक्ति और आज़ादी में वाह्य और अंतस का अंतर होता है।)